Body-Contouring Market India: 2031 तक ₹1.73 बिलियन पार, इन वजहों से बढ़ेगी डिमांड!

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AuthorAditya Rao|Published at:
Body-Contouring Market India: 2031 तक ₹1.73 बिलियन पार, इन वजहों से बढ़ेगी डिमांड!

भारत का एस्थेटिक डिवाइस मार्केट 2031 तक **$1.73 बिलियन** तक पहुंचने का अनुमान है। वजन घटाने वाली दवाओं की बढ़ती लोकप्रियता के कारण बॉडी-कंटूरिंग ट्रीटमेंट की डिमांड में भारी उछाल देखा जा रहा है, खासकर उन लोगों में जो दवा लेने के बाद ढीली त्वचा से परेशान हैं। निवेशकों को इस सेक्टर में रेगुलेटरी नियमों पर पैनी नजर रखनी चाहिए।

बाज़ार में क्यों आ रहा है उछाल?

भारत का मेडिकल एस्थेटिक्स सेक्टर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। Ozempic जैसी GLP-1 वजन घटाने वाली दवाओं की धूम के चलते अब लोग ढीली त्वचा और फैट के असमान वितरण जैसी समस्याओं के लिए एस्थेटिक सर्विस की तरफ रुख कर रहे हैं। जैसे-जैसे ये दवाएं लोगों को वजन कम करने में मदद कर रही हैं, वैसे-वैसे बॉडी-कंटूरिंग और स्किन-टाइटनिंंग प्रोसीजर की डिमांड भी बढ़ रही है। इस फिनोमिना को ग्लोबल मार्केट में 'पोस्ट-वेट-लॉस मेकओवर' भी कहा जाता है, और अब यह भारत के एस्थेटिक डिवाइस इंडस्ट्री की ग्रोथ को नई दिशा दे रहा है।

मार्केट का अनुमान और ग्रोथ

अनुमान है कि भारतीय एस्थेटिक डिवाइस मार्केट, जो 2026 में लगभग $870 मिलियन का था, 2031 तक $1.73 बिलियन के आंकड़े को छू लेगा। यह अगले पांच सालों में करीब 15% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) दर्शाता है। इसमें भी बॉडी-कंटूरिंग और सेल्युलाइट रिडक्शन डिवाइस सबसे आगे हैं, जिनके 17% की सालाना दर से बढ़ने की उम्मीद है। इन्वेस्टर्स के लिए यह एक खास संकेत है कि वे स्पेशलाइज्ड मेडिकल टेक्नोलॉजी और हाई-वैल्यू एस्थेटिक सर्विसेज पर ध्यान दें। यह समझना जरूरी है कि ये प्रोसीजर उन लोगों के लिए हैं जो पहले से ही अपने टारगेट वेट के करीब हैं, न कि बहुत ज्यादा फैट कम करने के लिए।

रेगुलेटरी और ऑपरेशनल चुनौतियाँ

भले ही डिमांड के आउटलुक मजबूत दिख रहे हैं, लेकिन इस सेक्टर को स्टैंडर्डाइजेशन की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। भारत में मेडिकल एस्थेटिक डिवाइस सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के तहत आते हैं। लेकिन, जमीनी हकीकत यह है कि हर क्लिनिक और प्रैक्टिशनर पर निगरानी का स्तर अलग-अलग है। देश भर में ऑपरेटरों की क्वालिफिकेशन को लेकर एक समान मानकों का अभाव एक बड़ा रिस्क साबित हो सकता है। इन प्रोसीजर की सेफ्टी और इफेक्टिवनेस सुनिश्चित करना लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी के लिए बेहद जरूरी है, वरना सर्विस की क्वालिटी या सेफ्टी को लेकर कोई भी चिंता कंज्यूमर कॉन्फिडेंस को डगमगा सकती है और रेगुलेटर्स का ध्यान खींच सकती है।

इन्वेस्टर्स के लिए ध्यान देने योग्य बातें

आगे चलकर, स्टेकहोल्डर्स का मुख्य फोकस इस बात पर रहेगा कि क्लिनिक्स में टेक्नोलॉजी को कितनी तेजी से अपनाया जाता है और कॉस्मेटिक प्रोसीजर के आसपास रेगुलेटरी माहौल कैसा रहता है। इन्वेस्टर्स को यह ट्रैक करना चाहिए कि डिवाइस मैन्युफैक्चरर्स इस बढ़ती डिमांड को पूरा करने के लिए अपने प्रोडक्ट्स को कैसे पोजिशन करते हैं और क्या हेल्थ अथॉरिटीज एस्थेटिक क्लिनिक्स के लिए सख्त गाइडलाइन्स लाती हैं। इस सेगमेंट का लॉन्ग-टर्म परफॉरमेंस GLP-1 दवाओं के लगातार इस्तेमाल, नॉन-इनवेसिव प्रोसीजर में हाई सेफ्टी स्टैंडर्ड्स बनाए रखने और हेल्थकेयर के बेहद कॉम्पिटिटिव और फ्रैगमेंटेड लैंडस्केप में इंडस्ट्री की ग्रोथ क्षमता पर निर्भर करेगा।

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