हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य की **96** फार्मा मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के कामकाज पर रोक लगा दी है। यह कदम सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (CDSCO) द्वारा **92** बैचों की क्वालिटी फेल होने की रिपोर्ट के बाद उठाया गया है, जो देश की दवा सप्लाई में हिमाचल के **35%** योगदान को देखते हुए काफी अहम है।
बड़ी कार्रवाई के पीछे की वजह
हिमाचल प्रदेश ड्रग्स कंट्रोल एडमिनिस्ट्रेशन ने सख्त रुख अपनाते हुए 96 मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटीज को तुरंत बंद करने के आदेश दिए हैं। इस कार्रवाई की नींव CDSCO की उस रिपोर्ट ने रखी, जिसमें राज्य से निकली 92 दवा बैचों को सेफ्टी और क्वालिटी स्टैंडर्ड्स पर खरा नहीं उतरने के कारण 'सब-स्टैंडर्ड' करार दिया गया। इन दवाओं में मुख्य रूप से रेस्पिरेटरी सिरप और दर्द निवारक दवाएं शामिल हैं।
दवाओं में क्या थी खामी?
इंडिपेंडेंट टेस्टिंग में पता चला है कि इन दवाओं में एम्ब्रोक्सोल हाइड्रोक्लोराइड (Ambroxol Hydrochloride) और लेवोसालबुटामोल (Levosalbutamol) जैसे मुख्य इंग्रीडिएंट्स की मात्रा तय मानकों के मुताबिक नहीं थी। कई सैंपल्स 'ऐसे' (Assay) और 'डिसोल्यूशन' (Dissolution) जैसे जरूरी टेस्ट्स में फेल पाए गए, जो यह तय करते हैं कि दवा शरीर में कैसे काम करेगी।
फार्मा हब पर क्या होगा असर?
हिमाचल प्रदेश, विशेष रूप से बद्दी और सोलन का इंडस्ट्रियल बेल्ट, भारत की 35% डोमेस्टिक दवाइयों की सप्लाई करता है। यहाँ 650 से ज्यादा यूनिट्स काम कर रही हैं। मौजूदा कार्रवाई का सबसे ज्यादा असर छोटे और मध्यम स्तर के उद्यमों (SMEs) पर पड़ रहा है।
आगे क्या होगा?
नियामक संस्थाएं अब 'गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज' (GMP) को लेकर कोई ढील बरतने के मूड में नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस सख्ती से छोटे प्लेयर्स पर कंप्लायंस का खर्च बढ़ेगा, जिससे आने वाले समय में मार्केट में कंसोलिडेशन देखने को मिल सकता है। साथ ही, दवा की क्वालिटी सिर्फ फैक्ट्री तक सीमित नहीं है—ट्रांसपोर्ट के दौरान तापमान और नमी का ध्यान रखना भी कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। निवेशकों को अब सप्लाई चेन में संभावित शॉर्टेज पर नजर रखनी होगी।
