कैंसर का इलाज हुआ महंगा: हेल्थ इंश्योरेंस के बावजूद जेब पर भारी पड़ रहा खर्च!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
कैंसर का इलाज हुआ महंगा: हेल्थ इंश्योरेंस के बावजूद जेब पर भारी पड़ रहा खर्च!

देश में कैंसर के मरीज इंश्योरेंस होने के बावजूद इलाज का 70-75% खर्च अपनी जेब से दे रहे हैं। नए और महंगे इलाज, टारगेटेड थेरेपी और नॉन-हॉस्पिटलाइजेशन खर्चे बीमा पॉलिसियों पर भारी पड़ रहे हैं।

भारत में कई कैंसर मरीजों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस का वादा तब टूट जाता है जब वे इस गंभीर बीमारी का सामना करते हैं। इंश्योरेंस पॉलिसियां एक सुरक्षा कवच मानी जाती हैं, लेकिन आजकल मरीज इलाज पर होने वाले कुल खर्च का 70% से 75% तक अपनी जेब से भर रहे हैं। बीमा कवरेज की राशि और असली मेडिकल बिलों के बीच यह अंतर परिवारों के लिए एक बड़ी आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है।

कवरेज में गैप की असलियत

बीमा पॉलिसियों के स्ट्रक्चर के कारण यह कवरेज गैप पैदा होता है। मान लीजिए आपकी पॉलिसी में ₹5 लाख का सम एश्योर्ड (Sum Insured) है, लेकिन कैंसर इलाज के लिए भुगतान अक्सर खास सब-लिमिट्स (Sub-limits) द्वारा तय होता है। ये पहले से तय कैप्स होते हैं कि बीमा कंपनी किसी खास सर्विस, जैसे कीमोथेरेपी सेशन, रेडिएशन थेरेपी या हॉस्पिटल रूम रेंट के लिए कितना भुगतान करेगी। जब ये कैप्स कम होते हैं, तो बाकी का खर्च मरीज को उठाना पड़ता है।

इसके अलावा, कई इंश्योरेंस प्लान आधुनिक मेडिकल एडवांसमेंट को ध्यान में नहीं रखते। टारगेटेड थेरेपी (Targeted Therapies) जैसे इलाज, जो कई तरह के कैंसर के लिए स्टैंडर्ड बन रहे हैं, अक्सर पॉलिसी से बाहर रखे जाते हैं या उन्हें इस तरह वर्गीकृत किया जाता है कि रीइंबर्समेंट (Reimbursement) मुश्किल हो जाए। कुछ मामलों में, ये जीवनरक्षक दवाएं आउट पेशेंट (Outpatient) के तौर पर दी जाती हैं, यानी मरीज को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं पड़ती। चूंकि कई पारंपरिक बीमा पॉलिसियां केवल 24 घंटे के हॉस्पिटलाइजेशन पर ही भुगतान करती हैं, इसलिए आउट पेशेंट खर्चों को अक्सर पूरी तरह से मना कर दिया जाता है, जिससे परिवार को पूरा खर्च उठाना पड़ता है।

अगली पीढ़ी की थेरेपी के साथ चुनौतियां

मेडिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि एडवांस्ड कैंसर केयर की ओर बढ़ता रुझान इन बढ़ते खर्चों का मुख्य कारण है। इम्यूनोथेरेपी (Immunotherapy) और ओरल टारगेटेड थेरेपी (Oral Targeted Therapies) जैसी ट्रीटमेंट्स बहुत असरदार तो हैं, लेकिन इनकी कीमत बहुत ज्यादा होती है, कभी-कभी एक सिंगल डोज का खर्च एक लाख रुपये से भी ऊपर चला जाता है। आयुष्मान भारत PM-JAY जैसी सरकारी योजनाओं में सालाना ₹5 लाख तक का कवरेज मिलता है, लेकिन यह एडवांस्ड या बार-बार होने वाले कैंसर के मामलों के लिए अक्सर काफी नहीं होता, जहां कुल खर्च ₹20-30 लाख से भी ज्यादा हो सकता है।

ऑन्कोलॉजिस्ट्स (Oncologists) बताते हैं कि बीमा प्रदाता अक्सर क्लेम अप्रूवल (Claim Approval) को सीमित करने के लिए टेक्निकल एक्सक्लूशन्स (Technical Exclusions) का इस्तेमाल करते हैं। इससे एक जटिल प्रक्रिया शुरू होती है, जहां परिवारों को, जो पहले से ही बीमारी के भावनात्मक बोझ से जूझ रहे होते हैं, लंबी रीइंबर्समेंट प्रक्रियाओं से निपटना पड़ता है। 'कैशलेस' (Cashless) सुविधाओं पर निर्भरता भी अक्सर पहले से अनुमति (Prior Authorization) की जरूरत या पॉलिसी की शर्तों के तहत कौन से ट्रीटमेंट्स कवर किए गए हैं, इस पर विवादों के कारण बाधित होती है।

वित्तीय प्रभाव और क्या करें मॉनिटर

घरों के लिए, यह सिस्टमैटिक समस्या का मतलब है कि हेल्थ इंश्योरेंस अक्सर वह व्यापक सुरक्षा कवच नहीं है जैसा दिखता है। हेल्थकेयर के लिए फाइनेंशियल प्लानिंग (Financial Planning) में अब सिर्फ कुल सम एश्योर्ड से आगे बढ़कर पॉलिसी के दस्तावेजों को गहराई से देखना होगा।

निवेशकों और उपभोक्ताओं को यह देखना चाहिए कि क्या बीमा कंपनियां नई ट्रीटमेंट विधियों को स्पष्ट रूप से कवर करने वाले विशेष कैंसर राइडर (Cancer Rider) या मॉड्यूलर पॉलिसियां (Modular Policies) पेश करना शुरू करती हैं। जैसे-जैसे हेल्थकेयर सेक्टर महंगी अगली पीढ़ी की दवाओं के साथ इनोवेशन कर रहा है, बीमाकर्ताओं की अपने उत्पादों को अपडेट करने की क्षमता महत्वपूर्ण होगी। भविष्य में, मरीजों के लिए मुख्य मॉनिटरेबल (Monitorable) यह जांचना होगा कि क्या कवरेज में आउट पेशेंट केयर, डायग्नोस्टिक टेस्ट और ऑन्कोलॉजी ट्रीटमेंट्स (Oncology Treatments) के लिए विशेष सब-लिमिट्स शामिल हैं, बजाय इसके कि केवल बेस हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियों पर निर्भर रहें।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.