गुजरात में भले ही फेफड़ों के कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन राज्य में तंबाकू (Tobacco) का उत्पादन पिछले साल के मुकाबले **10%** तक बढ़ गया है। यह तब है जब केंद्र सरकार किसानों को वैकल्पिक फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
उत्पादन में बढ़ोतरी और स्वास्थ्य चिंताएं
गुजरात, जो भारत के कुल तंबाकू उत्पादन का लगभग 45% हिस्सा है, में इस फसल की खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है। वहीं, गुजरात कैंसर एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट (GCRI) के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में फेफड़ों के कैंसर के मरीजों की संख्या में भी लगातार वृद्धि देखी जा रही है। साल 2021 में जहां 813 नए मामले सामने आए थे, वहीं 2025 तक यह आंकड़ा 1,133 तक पहुंचने का अनुमान है। पिछले पांच सालों में GCRI में कुल 4,830 फेफड़ों के कैंसर के मामले दर्ज किए गए, जिनमें से लगभग 81% पुरुष थे।
खेती का बढ़ता रकबा
स्वास्थ्य चिंताओं के बीच, राज्य में तंबाकू की खेती का रकबा भी बढ़ा है। राज्य के कृषि विभाग के 2026 के अनुमानों के मुताबिक, तंबाकू की खेती के लिए इस्तेमाल की जाने वाली जमीन और कुल उत्पादन, दोनों में 2023 की तुलना में 10% की बढ़ोतरी हुई है। 2026 के फाइनेंशियल ईयर में, गुजरात में करीब 2.13 लाख हेक्टेयर में तंबाकू की खेती की गई, जिससे लगभग 4.91 लाख टन उत्पादन का अनुमान है। एग्रीकल्चर और कंज्यूमर गुड्स सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए यह दिखाता है कि लंबे समय के स्वास्थ्य जोखिमों और सरकारी नीतियों के बावजूद, स्थानीय किसान अभी भी तंबाकू की खेती पर आर्थिक रूप से निर्भर हैं।
फसल बदलने में मुश्किलें
केंद्र सरकार ने इस निर्भरता को कम करने के लिए 'प्रधानमंत्री-राष्ट्रीय कृषि विकास योजना' (Pradhan Mantri-Rashtriya Krishi Vikas Yojana) के तहत 'फसल विविधीकरण कार्यक्रम' (Crop Diversification Programme) चलाया है। इसका मकसद गुजरात, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे प्रमुख तंबाकू उत्पादक राज्यों के किसानों को वैकल्पिक फसलों की ओर मोड़ना है। लेकिन, इस योजना के कार्यान्वयन में बड़ी बाधाएं आ रही हैं। 2021 से 2025 के बीच, केंद्र सरकार ने ₹53.1 करोड़ आवंटित किए, लेकिन राज्यों को केवल ₹18.56 करोड़ ही जारी किए गए। इसमें से भी, केवल ₹9.88 करोड़ का ही वास्तव में उपयोग हो पाया। यह दर्शाता है कि तंबाकू की खेती से होने वाला आर्थिक लाभ, वैकल्पिक फसलों के लिए मिलने वाले प्रोत्साहनों से कहीं ज्यादा है।
सेक्टर पर असर
यह स्थिति व्यापक अर्थव्यवस्था और तंबाकू आधारित उपभोक्ता उत्पादों से जुड़ी कंपनियों के लिए एक जटिल माहौल बनाती है। हालांकि तंबाकू किसानों के लिए एक अधिक मुनाफे वाली फसल बनी हुई है, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी बढ़ते प्रमाण इसके लंबे समय की मांग और सरकारी नीतियों के लिए एक जोखिम पैदा करते हैं। इस इंडस्ट्री में निवेश करने वाले निवेशक अक्सर इन रुझानों पर नजर रखते हैं, क्योंकि इससे एक्साइज ड्यूटी, विज्ञापन पर पाबंदियां या सरकारी समर्थन में बदलाव हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विविधीकरण कार्यक्रम कितना प्रभावी साबित होता है और क्या राज्य बड़े पैमाने पर किसानों को तुलनीय वित्तीय रिटर्न देने वाली फसलों की ओर मोड़ने में सफल हो पाता है।
