Department of Pharmaceuticals ने दवा कंपनियों के मार्केटिंग नियमों पर लगाम कसने की तैयारी कर ली है। डॉ. एम. श्रीनिवास की अध्यक्षता में **3** सदस्यीय पैनल का गठन किया गया है, जो यह देखेगा कि क्या मौजूदा नियमों को कानूनी रूप से अनिवार्य (Legally Binding) बनाया जाना चाहिए।
सरकार ने देश में दवा कंपनियों के लिए मार्केटिंग गाइडलाइंस की औपचारिक समीक्षा शुरू कर दी है। NITI Aayog के सदस्य डॉ. एम. श्रीनिवास की अगुवाई में इस 3 सदस्यीय विशेषज्ञ पैनल को नियुक्त किया गया है, जिसका मकसद 'Uniform Code for Pharmaceutical Marketing Practices' (UCPMP) की प्रभावशीलता को परखना है। इस समिति में पूर्व स्वास्थ्य सचिव प्रीति सूडान और मेदांता (Medanta) के चेयरमैन डॉ. नरेश त्रेहान भी शामिल हैं।\n\n### मौजूदा नियमों में क्या है समस्या?\n\nइस पैनल का मुख्य उद्देश्य यह तय करना है कि क्या साल 2024 का मौजूदा UCPMP, जो कि अभी एक स्वैच्छिक (Self-regulatory) कोड के तौर पर काम करता है, पर्याप्त निगरानी रखने में सक्षम है। सालों से यह इंडस्ट्री स्वेच्छा से बनाए गए नियमों का पालन कर रही है, ताकि डॉक्टर और अस्पतालों को दिए जाने वाले अनुचित तोहफों या फाइनेंशियल लालच पर रोक लगाई जा सके। अब सरकार यह जांच रही है कि क्या इन स्वैच्छिक उपायों के बजाय एक कड़े, कानूनी और अनिवार्य ढांचे की जरूरत है।\n\n### फार्मा कंपनियों पर क्या होगा असर?\n\nनिवेशकों के नजरिए से यह बदलाव काफी अहम है, क्योंकि दवा कंपनियों के कुल खर्च (SG&A expenses) में मार्केटिंग और प्रमोशन का हिस्सा काफी बड़ा होता है। अगर सरकार स्वैच्छिक कोड को कानून में बदलती है, तो कंपनियों को सख्त कंप्लायंस और भारी ऑडिटिंग का सामना करना पड़ सकता है। इससे न केवल मार्केटिंग खर्चों के तौर-तरीके बदलेंगे, बल्कि आक्रामक मार्केटिंग पर लगाम लगने से मार्जिन और बिजनेस मॉडल पर भी असर पड़ सकता है।\n\n### दो महीने का समय तय\n\nसमिति को अपनी पहली मीटिंग के बाद 2 महीने के भीतर अंतिम सिफारिशें सौंपने का निर्देश दिया गया है। मार्केट की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या सरकार सख्त दंड का प्रावधान लाती है या फिर मार्केटिंग खर्च के लिए एक अधिक कठोर ऑडिटिंग सिस्टम तैयार करती है। आने वाले समय में यही सिफारिशें सेक्टर का नया कंप्लायंस लैंडस्केप तय करेंगी।
