बल्क ड्रग PLI स्कीम में बड़ा बदलाव, इंपोर्ट पर निर्भरता घटाने की तैयारी

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AuthorMehul Desai|Published at:
बल्क ड्रग PLI स्कीम में बड़ा बदलाव, इंपोर्ट पर निर्भरता घटाने की तैयारी

सरकार ने बल्क ड्रग्स के लिए प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम में बड़ा फेरबदल किया है। अब इस स्कीम में रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ग्रांट्स भी जोड़ी जाएंगी। इसका मकसद जरूरी दवाओं के कंपोनेंट्स के लिए विदेशी इंपोर्ट पर देश की भारी निर्भरता को कम करना और डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना है।

Detailed Coverage

इंपोर्ट पर निर्भरता घटाने की नई रणनीति

भारत सरकार ने बल्क ड्रग्स के लिए अपनी प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम में बड़े बदलाव का ऐलान किया है। अब इस स्कीम के तहत दवा कंपनियों को टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट, इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेडेशन और बेहतर फाइनेंसिंग के लिए नई ग्रांट्स (Grants) भी मिलेंगी। यह कदम देश की फार्मा इंडस्ट्री को और मजबूत बनाने के इरादे से उठाया गया है। अब सरकार रिसर्च से लेकर फाइनल प्रोडक्शन तक, हर स्टेज पर कंपनियों को सपोर्ट करेगी ताकि डोमेस्टिक प्लेयर्स विदेशी इंपोर्टर्स को टक्कर दे सकें।

सप्लाई चेन की कमजोरियों को दूर करने की कोशिश

भारत भले ही फिनिश्ड मेडिसिन्स का एक बड़ा सप्लायर हो, लेकिन एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (APIs) और की स्टार्टिंग मैटेरियल्स (KSMs) के लिए हम अभी भी बड़ी मात्रा में दूसरे देशों, खासकर चीन पर निर्भर हैं। यह इंपोर्ट पर निर्भरता सप्लाई चेन के लिए बड़ा रिस्क पैदा करती है। विदेशी मार्केट में किसी भी तरह की प्राइस वोलैटिलिटी (Price Volatility) या सप्लाई में रुकावट भारतीय दवा कंपनियों की प्रोडक्शन कॉस्ट और ऑपरेशनल स्टेबिलिटी पर सीधा असर डाल सकती है। इसी को देखते हुए, सरकार डोमेस्टिक प्रोडक्शन को बढ़ावा देकर इन जरूरी कंपोनेंट्स की सप्लाई को और स्टेबल बनाना चाहती है।

पिछली सफलताओं पर एक और कदम

कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू की गई PLI स्कीम के पहले फेज में 29 KSMs और APIs के लिए डोमेस्टिक कैपेसिटी एस्टैब्लिश करने में सफलता मिली थी, जिसमें पेनिसिलिन जी (Penicillin G) जैसे जरूरी आइटम्स भी शामिल थे। इन शुरुआती कामयाबियों ने दिखाया कि पॉलिसी सपोर्ट से भारतीय फर्म्स की कॉस्ट डिसएडवांटेज (Cost Disadvantage) को कम किया जा सकता है। हालांकि, इंडस्ट्री फीडबैक से यह भी पता चला कि सिर्फ प्रोडक्शन इंसेंटिव्स काफी नहीं थे। कंपनियों को हाई यूटिलिटी कॉस्ट (High Utility Costs) और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजीज (Advanced Manufacturing Technologies) जैसी दिक्कतों से निपटने में परेशानी हो रही थी।

फार्मा सेक्टर के लिए स्ट्रेटेजिक बदलाव

डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्युटिकल्स अब स्टेट गवर्नमेंट्स के साथ मिलकर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी दिक्कतों, जैसे कि केमिकल मैन्युफैक्चरिंग में बड़ा खर्च वाली यूटिलिटी कॉस्ट्स को दूर करने की कोशिश कर रहा है। प्राइवेट कंपनियों और नेशनल लैब्स के बीच कोलैबोरेशन (Collaboration) को बढ़ावा देकर, सरकार इनोवेशन गैप (Innovation Gap) को पाटना चाहती है। हाई-वैल्यू प्रोडक्शन की ओर यह कदम API और स्पेशियलिटी केमिकल स्पेस में काम करने वाली कंपनियों के बिजनेस एडवांटेज (Business Advantage) को बेहतर बना सकता है।

निवेशकों के लिए, इस रीवाम्प्ड स्कीम की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ये नई ग्रांट्स कितनी प्रभावी ढंग से लागू होती हैं और क्या इनसे इनपुट कॉस्ट्स में वाकई कमी आती है। कंपनियां R&D के लिए इन इंसेंटिव्स का कितना फायदा उठा पाती हैं, यह आने वाली तिमाहियों में एक अहम मॉनिटर करने लायक फैक्टर (Monitorable Factor) होगा। स्टेकहोल्डर्स को प्रोजेक्ट गाइडलाइन्स, फंड्स के एलोकेशन (Allocation) और मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही बताएगा कि अलग-अलग फर्में अपनी मार्केट पोजीशन को मजबूत करने के लिए इस नए सपोर्ट फ्रेमवर्क का इस्तेमाल कैसे करती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.