सरकार Medical Devices Rules, 2017 में बड़े बदलाव की तैयारी में है। अब रेगुलेटर्स को खराब क्वालिटी के मेडिकल उपकरणों के प्रोडक्शन को रोकने और उन्हें नष्ट करने का सीधा अधिकार होगा, जिससे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जवाबदेही बढ़ेगी।
रेगुलेटरी पावर में बड़ा बदलाव
केंद्र सरकार ने हेल्थकेयर इक्विपमेंट सेक्टर के लिए नियमों में बदलाव का प्रस्ताव रखा है। इस संशोधन के तहत, सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) और राज्य स्तरीय लाइसेंसिंग अथॉरिटीज को अब यह अधिकार मिल जाएगा कि वे खराब या सब-स्टैंडर्ड मेडिकल डिवाइस बनाने वाली कंपनियों पर तुरंत 'स्टॉप-प्रोडक्शन' और 'स्टॉप-सेल' ऑर्डर जारी कर सकें।
फिलहाल, 1940 के ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत लाइसेंसिंग की प्रक्रिया तो है, लेकिन तुरंत एक्शन लेने के लिए सख्त टूल्स की कमी थी। इस नए प्रस्ताव के बाद, इम्प्लांट्स, सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट्स और डायग्नोस्टिक टूल्स जैसे उपकरणों में खामी पाए जाने पर उन्हें तुरंत नष्ट (Destroy) करने का आदेश दिया जा सकेगा, ताकि ये वापस सप्लाई चेन में न आ सकें।
मैन्युफैक्चरर्स पर इसका असर
इन्वेस्टर्स के लिए यह खबर एक बड़ी सतर्कता का संकेत है। जिन कंपनियों का क्वालिटी मैनेजमेंट सिस्टम पहले से ही इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स के हिसाब से मजबूत है, उन्हें फायदा हो सकता है। लेकिन, छोटी और असंगठित कंपनियां जो क्वालिटी कंट्रोल में कोताही बरतती हैं, उनके लिए अनुपालन लागत (Compliance Cost) और ऑपरेशनल दबाव बढ़ सकता है।
मार्केट के लिए क्या हैं मायने?
बाजार के जानकारों का मानना है कि यह सेक्टर की साख सुधारने की दिशा में एक कदम है। इससे न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम कम होगा, बल्कि भारत के मेडिकल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभरने की प्रक्रिया में ग्लोबल ट्रस्ट भी बढ़ेगा। हालांकि, कंपनियों को क्वालिटी और डिस्पोजल स्टैंडर्ड्स को पूरा करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर में एक्स्ट्रा इन्वेस्टमेंट करना पड़ सकता है, जिस पर निवेशकों को नजर रखनी चाहिए।
