लगातार 14 महीनों की बिकवाली के बाद FPIs ने भारतीय हेल्थकेयर सेक्टर में बड़ा दांव लगाया है। जुलाई से मिड-सितंबर 2026 के बीच विदेशी निवेशकों ने **₹15,800 करोड़** का निवेश किया है। हालांकि, एक्सपर्ट्स ने कुछ सेगमेंट में बढ़ती वैल्यूएशन को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी है।
पिछले 14 महीनों तक लगातार बिकवाली करने के बाद अब फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) का मूड बदल गया है। अप्रैल 2025 से जून 2026 के बीच FPIs ने इस सेक्टर से ₹40,160 करोड़ की निकासी की थी, लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।
इस नई खरीदारी का सीधा असर Nifty Healthcare इंडेक्स पर दिख रहा है, जो साल की शुरुआत से अब तक 15% ऊपर चढ़ चुका है। विदेशी निवेशकों के लौटने के पीछे सिर्फ डिफेंसिव पोर्टफोलियो बनाना ही नहीं, बल्कि कंपनियों के मजबूत फंडामेंटल्स हैं। फार्मा कंपनियों का विस्तार, अमेरिकी जेनेरिक बाजार में मजबूती और भारत में अस्पताल व डायग्नोस्टिक नेटवर्क का बढ़ना इसकी मुख्य वजहें हैं।
निवेश के नए मौके
संस्थागत निवेशक अब चुनिंदा सेगमेंट्स पर दांव लगा रहे हैं। इनमें CDMO (कॉन्ट्रैक्ट डेवलपमेंट एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑर्गनाइजेशन) और GLP-1 से जुड़ी नई ट्रीटमेंट्स के अवसर शामिल हैं। अस्पतालों की बात करें तो Narayana Hrudayalaya जैसी कंपनियों पर सबकी नजरें हैं, जो लगातार अपनी कैपेसिटी बढ़ा रही हैं।
वैल्यूएशन का रिस्क और सावधानी
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब 'आसान कमाई' का दौर खत्म हो गया है। CDMO और CRAMS जैसे स्पेस में वैल्यूएशन काफी महंगी हो गई है, जिससे रिसर्च डेस्क अब स्टॉक चुनने को लेकर ज्यादा सतर्क हो गए हैं।
Sun Pharmaceutical Industries और Cipla जैसे दिग्गज खिलाड़ी अभी भी निवेशकों की पहली पसंद बने हुए हैं। वहीं, Torrent Pharmaceuticals और Divi’s Laboratories जैसे स्पेशलिटी एक्सपोर्ट पोर्टफोलियो वाले शेयरों पर भी निवेशकों की नजरें हैं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आने वाले समय में कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी और हाई वैल्यूएशन के बीच तालमेल बिठाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। निवेशकों को कंपनी के अर्निंग परफॉर्मेंस और हॉस्पिटल नेटवर्क के कैपिटल प्रोजेक्ट्स के एग्जीक्यूशन पर नजर रखनी चाहिए।
