दुनिया भर में मोटापे की दवाओं (Obesity Drugs) की भारी डिमांड के चलते दवा कंपनियों के कारोबार में जबरदस्त उछाल आने वाला है। साल 2032 तक ग्लोबल प्रिस्क्रिप्शन ड्रग सेल्स (Prescription Drug Sales) **2 ट्रिलियन डॉलर** के आंकड़े को पार कर सकती है। इस रेस में Eli Lilly सबसे आगे निकल सकती है, जिसकी मोटापे की दवा Tirzepatide इतिहास की सबसे ज्यादा बिकने वाली दवा बन सकती है।
मोटापे की दवाएं बनेंगी कमाई का सबसे बड़ा जरिया
मार्केट डेटा प्रोवाइडर Evaluate की मानें तो, साल 2030 तक एंटी-ओबेसिटी दवाएं ग्लोबल प्रिस्क्रिप्शन ड्रग मार्केट का करीब 9% हिस्सा होंगी। यह ग्रोथ इस बड़े ट्रेंड का हिस्सा है, जिसके चलते 2032 तक कुल ग्लोबल प्रिस्क्रिप्शन सेल्स 2 ट्रिलियन डॉलर के पार जा सकती है।
Eli Lilly और Tirzepatide का जलवा
इस ट्रेंड का सबसे बड़ा फायदा Eli Lilly को मिलता दिख रहा है। कंपनी का रेवेन्यू 2032 तक बढ़कर 137 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। इस ग्रोथ का मुख्य कारण Tirzepatide है, जो कंपनी के Mounjaro और Zepbound प्रोडक्ट्स का एक्टिव इंग्रेडिएंट है। इंडस्ट्री की भविष्यवाणी है कि 2032 तक Tirzepatide की सेल्स करीब 70 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है, जो इसे इतिहास की सबसे ज्यादा बिकने वाली दवा बना सकती है। इस परफॉरमेंस से Eli Lilly, AbbVie जैसी बड़ी कंपनियों को पछाड़कर ग्लोबल प्रिस्क्रिप्शन ड्रग सेल्स में नंबर वन बन सकती है।
मार्केट की चुनौतियां और निवेशकों के लिए जरूरी बातें
हालांकि, इन दवाओं की बढ़ती डिमांड ने हेल्थकेयर इन्वेस्टर्स (Healthcare Investors) की दिलचस्पी बढ़ा दी है, लेकिन इस सेक्टर के सामने कुछ खास चुनौतियां भी हैं। मोटापे के इलाज की दवाओं की डिमांड फिलहाल बहुत ज्यादा है, लेकिन इनकी लॉन्ग-टर्म प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) कई बातों पर निर्भर करेगी। इसमें मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी (Manufacturing Capacity), इंश्योरेंस कवरेज (Insurance Coverage) और सरकारी नियम (Government Pricing Regulations) शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर, इन इंजेक्टेबल दवाओं के बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन के लिए नई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स में भारी निवेश की जरूरत होगी, जिससे सप्लाई चेन (Supply Chain) को लेकर भी रिस्क बढ़ सकता है।
इसके अलावा, फार्मा इंडस्ट्री में अक्सर पेटेंट एक्सपायर (Patent Cliffs) होने का खतरा रहता है, जिसके बाद सस्ती जेनेरिक दवाएं मार्केट में आ जाती हैं। फिलहाल Tirzepatide कंपनी के लिए ग्रोथ इंजन है, लेकिन कंपनी के मार्जिन पर लॉन्ग-टर्म असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां अपने प्रोडक्ट पाइपलाइन (Product Pipeline) को कितनी अच्छी तरह मैनेज करती हैं और मोटापे व इंफ्लेमेटरी बीमारियों (Inflammatory Diseases) की कैटेगरी में नए कंपटीटर्स से अपनी मार्केट शेयर कैसे बचाती हैं।
इस सेक्टर पर नजर रखने वाले इन्वेस्टर्स को प्रोडक्शन वॉल्यूम (Production Volumes) और मार्केट पेनिट्रेशन (Market Penetration) की जानकारी के लिए आने वाली तिमाही नतीजों पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, ड्रग प्राइसिंग (Drug Pricing) और रीइम्बर्समेंट पॉलिसी (Reimbursement Policies) को लेकर होने वाली रेगुलेटरी चर्चाओं (Regulatory Discussions) पर नजर रखना भी जरूरी होगा, क्योंकि यही तय करेगा कि 2 ट्रिलियन डॉलर की अनुमानित ग्लोबल सेल्स में से कितना हिस्सा फार्मा कंपनियों के लिए सस्टेनेबल प्रॉफिट मार्जिन (Sustainable Profit Margins) में बदल पाता है।
