दुनिया की दिग्गज फार्मा कंपनी Eli Lilly ने अब भारत की ओर रुख किया है। $1 ट्रिलियन से ज्यादा की मार्केट कैप वाली यह कंपनी भारत में मैन्युफैक्चरिंग और बायोटेक पार्टनरशिप की संभावनाएं तलाश रही है। कंपनी के CEO David A. Ricks ने भारत के टैलेंट पूल को अपनी ग्रोथ के लिए बेहद अहम बताया है।
भारत में बड़े निवेश की तैयारी
Eli Lilly के CEO David A. Ricks ने स्पष्ट किया है कि कंपनी भारत में अपनी उपस्थिति को मजबूती देने के लिए गंभीर है। कंपनी यहाँ मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी लगाने और लोकल बायोटेक कंपनियों के साथ साझेदारी करने पर विचार कर रही है। हेल्थकेयर सेक्टर में $1 ट्रिलियन का मार्केट कैप पार करने वाली यह पहली कंपनी है, जो अपनी इस सफलता के बाद ग्लोबल एक्सपेंशन पर जोर दे रही है।
कंपनी की इस तेजी की मुख्य वजह उनकी मेटाबोलिक ड्रग्स, Mounjaro और Zepbound की जबरदस्त डिमांड है। 2026 की दूसरी तिमाही में कंपनी का रेवेन्यू $23 बिलियन रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 48% ज्यादा है। दमदार नतीजों के बाद कंपनी ने पूरे साल का रेवेन्यू गाइडेंस बढ़ाकर $85 बिलियन से $87 बिलियन के बीच कर दिया है। 1 अक्टूबर 2026 तक कंपनी का शेयर $1,157 के आसपास ट्रेड कर रहा था।
इंडिया में क्या है कंपनी का प्लान?
कंपनी पहले से ही बेंगलुरु में एक रिसर्च हब चला रही है, लेकिन अब प्लान बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर और वुमन हेल्थ, साइकियाट्री और संक्रामक बीमारियों जैसे क्षेत्रों में निवेश का है। भारतीय साइंटिफिक टैलेंट और बढ़ते हेल्थकेयर इकोसिस्टम का फायदा उठाकर कंपनी अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करना चाहती है।
निवेशकों के लिए जोखिम और चुनौतियां
ग्रोथ स्टोरी मजबूत है, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं:
- कॉम्पिटिशन का दबाव: GLP-1 वेट-लॉस दवाओं में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण कीमतों में गिरावट और मुनाफे के मार्जिन पर दबाव आ सकता है।
- एक्विजिशन रिस्क: नई कंपनियों के अधिग्रहण के बाद उन्हें अपने बिजनेस स्ट्रक्चर में सही तरीके से फिट करना एक महंगी और जटिल प्रक्रिया हो सकती है।
- प्राइसिंग कॉम्प्लेक्सिटी: अलग-अलग देशों में इंश्योरेंस और रेगुलेटरी पॉलिसी अलग होने के कारण कंपनी की टियर्ड प्राइसिंग स्ट्रैटेजी रेवेन्यू में स्थिरता बनाए रखने में चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है।
निवेशक अब कंपनी के अगले कदम यानी भारत में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट या बायोटेक डील की औपचारिक घोषणाओं पर नजर बनाए हुए हैं।
