मुंबई स्थित ENTOD Pharmaceuticals ने टॉपिकल इंसुलिन आई ड्रॉप्स के लिए पेटेंट हासिल कर लिया है। यह दवा अभी प्री-क्लिनिकल स्टेज में है, लेकिन कंपनी का यह कदम जेनरिक मैन्युफैक्चरिंग से हटकर ओरिजिनल ड्रग रिसर्च की ओर बढ़ते हुए भारतीय फार्मा सेक्टर के बड़े बदलाव को दर्शाता है।
वैल्यू-एडेड रिसर्च की ओर बड़ा कदम
भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए यह पेटेंट एक बड़े रणनीतिक बदलाव का संकेत है। अब तक कई दवा कंपनियां कम मार्जिन वाली जेनरिक दवाओं पर निर्भर रही हैं, जहाँ मुकाबला बहुत ज्यादा है। लेकिन इंसुलिन को सीधे आंखों के जरिए पहुंचाने जैसी नई तकनीक अपनाकर कंपनियां अपनी एक अलग पहचान और 'प्राइसिंग पावर' बनाने की कोशिश कर रही हैं। यह बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) भविष्य में कंपनी के लिए बड़ा एसेट साबित हो सकती है।
क्लिनिकल ट्रायल की चुनौतियां
पेटेंट मिलना नवाचार की शुरुआत है, लेकिन सफलता की गारंटी नहीं। किसी भी नई दवा को बाजार में आने से पहले Central Drugs Standard Control Organisation (CDSCO) और अन्य वैश्विक संस्थाओं के कड़े मानकों से गुजरना होता है। ड्रग डेवलपमेंट एक खर्चीला और लंबा सफर है। कई बार दवाएं लैब में सफल होती हैं लेकिन इंसानों पर ट्रायल के दौरान सुरक्षा मानकों या असर के मामले में फेल हो जाती हैं। निवेशकों को यह समझना होगा कि इस प्री-क्लिनिकल स्टेज से लेकर कॉमर्शियल लॉन्च तक कंपनी की कैश फ्लो और रिसर्च पर काफी दबाव रहेगा।
आगे की राह
अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि कंपनी कब इन आई ड्रॉप्स को लैब से निकालकर इंसानों पर क्लिनिकल ट्रायल शुरू करती है। ट्रायल का डेटा ही तय करेगा कि यह दवा बाजार में कितनी सफल होगी और कंपनी को इसका कितना बड़ा फायदा मिलेगा।
