European Medicines Agency (EMA) ने क्लिनिकल ट्रायल्स के लिए नए नियम पेश किए हैं। अब कंपनियों को जेंडर-डेटा पर ज्यादा फोकस करना होगा, जिससे R&D खर्च बढ़ने और मंजूरी मिलने में देरी होने की आशंका है।
क्लिनिकल ट्रायल्स में बड़ा बदलाव
European Medicines Agency (EMA) ने एक नया रोडमैप तैयार किया है, जिसका मकसद क्लिनिकल ट्रायल्स में जेंडर असमानता को दूर करना है। अभी तक कई बार दवा के असर और साइड इफेक्ट्स की जांच में महिलाओं और पुरुषों के बीच के शारीरिक अंतर को नजरअंदाज किया जाता रहा है। अब रेगुलेटर ने नियम सख्त कर दिए हैं, जिसके तहत कंपनियों को डेटा को जेंडर के आधार पर अलग-अलग (sex-disaggregated data) रिपोर्ट करना अनिवार्य होगा।
फार्मा कंपनियों पर क्या होगा असर?
फार्मा सेक्टर में कंपनियों का एक बड़ा हिस्सा क्लिनिकल ट्रायल्स पर खर्च होता है। अब नई गाइडलाइन्स के चलते कंपनियों को अपने ट्रायल प्रोटोकॉल दोबारा डिजाइन करने पड़ेंगे। इससे न केवल ट्रायल्स की अवधि लंबी हो सकती है, बल्कि R&D का बजट भी काफी बढ़ सकता है। अगर कंपनियां इन मानकों पर खरी नहीं उतरीं, तो उन्हें यूरोप के बाजारों में मंजूरी पाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
भारतीय निवेशकों के लिए सतर्क रहने का समय
भारत, यूरोप के बाजारों के लिए जेनेरिक और स्पेशलिटी दवाओं का एक बड़ा सप्लायर है। अगर दवा निर्यात करने वाली भारतीय कंपनियों का R&D खर्च बढ़ता है या अप्रूवल में देरी होती है, तो इसका सीधा असर उनके Margins पर पड़ेगा।
निवेशकों को 2026 के अंत तक आने वाली फाइनल गाइडलाइन्स पर नजर रखनी चाहिए। फिलहाल फार्मा कंपनियों के मैनेजमेंट द्वारा R&D बजट और क्लिनिकल पाइपलाइन को लेकर दिए जाने वाले बयानों पर नजर बनाए रखना बहुत जरूरी है। जो कंपनियां बिना मुनाफा घटाए खुद को इन नए मानकों के हिसाब से ढाल लेंगी, वही आगे चलकर मार्केट में अपनी पकड़ बनाए रखेंगी।
