इंडिया बिजनेस में शानदार वापसी, पर प्रॉफिट पर भारी पड़ी वन-ऑफ लागतें
डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज ने अपने इंडिया बिजनेस में ज़बरदस्त वापसी की है। फाइनेंशियल ईयर 2026 (FY26) की चौथी तिमाही (Q4) में सेल्स में 20% का जोरदार उछाल देखा गया, जबकि पूरे साल के रेवेन्यू में 16% की बढ़त दर्ज हुई। इस ग्रोथ का श्रेय स्ट्रैटेजिक पोर्टफोलियो एडजस्टमेंट और बेहतर प्रोडक्टिविटी को दिया जा रहा है। FY26 में कंपनी का कुल रेवेन्यू ₹33,593 करोड़ रहा, जिसमें भारत का योगदान करीब 18-19% रहा।
हालांकि, यह अच्छी खबर एक बड़ी चिंता के साथ आई है। Q4 FY26 में नेट प्रॉफिट 86% घटकर सिर्फ ₹220 करोड़ रह गया। इस भारी गिरावट की मुख्य वजहें रही वन-ऑफ चार्जेस, जिनमें शेल्फ स्टॉक एडजस्टमेंट, आर एंड डी इंपेयरमेंट, और वैट लायबिलिटीज व नए लेबर कोड्स के लिए प्रोविजन्स शामिल हैं। पूरे साल का प्रॉफिट बिफोर टैक्स भी 29% घटकर ₹5,481 करोड़ पर आ गया।
क्रॉनिक थेरेपी में 'गैप': टॉप लीग में जाने की राह में रोड़ा
जहां डॉ. रेड्डीज बाजार की ग्रोथ से बेहतर प्रदर्शन कर रही है, वहीं कंपनी के पोर्टफोलियो में एक बड़ी 'गैप' (gap) है, जो इसे टॉप फार्मा प्लेयर्स से पीछे रख रही है। इंडियन फार्मास्युटिकल मार्केट (IPM) आजकल क्रॉनिक थेरेपीज़ (जैसे कार्डियक और एंटी-डायबिटिक दवाएं) की ग्रोथ से चल रहा है। अप्रैल 2026 तक IPM में क्रॉनिक थेरेपीज़ की ग्रोथ 14.2% रही, जबकि एक्यूट थेरेपीज़ 7.8% पर रहीं। IPM का 40% से ज़्यादा हिस्सा अब क्रॉनिक सेगमेंट से आता है।
लेकिन, डॉ. रेड्डीज के इंडिया रेवेन्यू में क्रॉनिक थेरेपीज़ का हिस्सा सिर्फ 20% से भी कम है। एनालिस्ट्स का मानना है कि यह स्ट्रक्चरल कमजोरी कंपनी को टॉप फार्मा प्लेयर्स में ऊपर चढ़ने से रोक रही है। कंपनी मैनेजमेंट इस असंतुलन को स्वीकार करती है और कहा है कि वे ऑर्गेनिक लॉन्च व इनऑर्गेनिक एक्विजिशन के जरिए अपने क्रॉनिक थेरेपी पोर्टफोलियो को बढ़ाने पर काम कर रहे हैं।
वैल्यूएशन और कंपीटिटर्स
मई 2026 तक डॉ. रेड्डीज का पीई रेश्यो (P/E ratio) लगभग 17.5-19.5 के बीच था, और मार्केट कैप लगभग ₹1.06 लाख करोड़ था। इसकी तुलना में, बड़ी कंपनियाँ जैसे सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज़ का पीई रेश्यो 40.3 के आसपास है, जिसका मार्केट कैप ₹4.4 लाख करोड़ है। सिप्ला और ज़ाइडस लाइफसाइंसेज के पीई रेश्यो डॉ. रेड्डीज के करीब 23-24 और 19.5 हैं। कुल मिलाकर, भारतीय फार्मा मार्केट FY26 में करीब 8.8% बढ़ा है, और इसमें हाई-वैल्यू क्रॉनिक ट्रीटमेंट्स और डायबिटीज मैनेजमेंट में GLP-1 थेरेपीज़ का चलन बढ़ा है।
एनालिस्ट्स की राय और भविष्य की राह
रेवेन्यू में रिकवरी के बावजूद, Q4 FY26 में प्रॉफिटेबिलिटी में आई भारी गिरावट और मार्जिन पर दबाव 'बीयर केस' यानी मंदी के पक्ष की दलीलों को मजबूत करता है। ब्रोकरेज हाउस की राय बंटी हुई है। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज़ ने 'Reduce' रेटिंग और ₹1,175 का टारगेट प्राइस दिया है। मॉर्गन स्टैनली ने 'Equal-weight' रेटिंग के साथ टारगेट घटाकर ₹1,195 किया है, जबकि गोल्डमैन सैक्स ने ₹1,050 के टारगेट के साथ 'Sell' रेटिंग दोहराई है। उनका कहना है कि लेनालिडोमाइड सेल्स में कमी और शेल्फ स्टॉक एडजस्टमेंट के कारण रेवेन्यू और EBITDA मार्जिन में कमी आई।
कंसेंसस एनालिस्ट रेटिंग 'Hold' की ओर झुकी हुई है, जिसका औसत टारगेट प्राइस लगभग ₹1,293 है। यह स्टॉक में तत्काल बड़ी तेजी की उम्मीद को सीमित करता है। क्रॉनिक थेरेपीज़ में लगातार बनी हुई कमजोरी एक बड़ी स्ट्रक्चरल दिक्कत है, जो कंपटीटर्स की तुलना में मार्केट शेयर बढ़ाने में बाधा डाल सकती है।
भविष्य की बात करें तो डॉ. रेड्डीज सेमाग्लूटाइड जैसी इनोवेटिव प्रोडक्ट्स और प्लान्ड बायोसिमिलर लॉन्च से ग्रोथ और मार्जिन बढ़ाने की उम्मीद कर रही है। मैनेजमेंट का मानना है कि सेमाग्लूटाइड के लिए बड़ा पेन (pen) बिक्री दिखेगी और FY28 तक कैपेसिटी बढ़ेगी। हालांकि, कंपनी को क्रॉनिक थेरेपी सेगमेंट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी होगी, जो कि लगातार ब्रॉड-बेस्ड ग्रोथ हासिल करने के लिए बहुत ज़रूरी है।
