दिल्ली हाई कोर्ट ने HPV वैक्सीनेशन प्रोग्राम को रोकने की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, **56 लाख** डोज में से केवल **120** प्रतिकूल घटनाएं (adverse events) सामने आईं और एक भी मौत नहीं हुई, जिसे देखते हुए कोर्ट ने किसी खतरे से इनकार किया है।
जुलाई 2026 के अंत में आए अपने फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने HPV वैक्सीनेशन प्रोग्राम के खिलाफ दायर जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। याचिकाकर्ताओं ने टीकाकरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुरक्षा निगरानी पर सवाल उठाते हुए इसे तुरंत रोकने की मांग की थी।
क्या रहे सुरक्षा के आंकड़े?
सुनवाई के दौरान सरकारी रिपोर्ट में बताया गया कि अब तक देश भर में 56 लाख से अधिक डोज दी जा चुकी हैं, जिनमें केवल 120 प्रतिकूल मामले सामने आए हैं। सबसे अहम बात यह है कि डेटा में वैक्सीन से जुड़ी किसी भी मौत की पुष्टि नहीं हुई है। इन आंकड़ों के आधार पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर कोई ऐसा तात्कालिक खतरा नहीं है, जिसके आधार पर इस सरकारी अभियान पर रोक लगाई जाए।
उठाए गए थे ये कानूनी सवाल
यह मामला 'यूनिवर्सल हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन' (Universal Health Organisation) और डॉ. सुजाता मित्तल द्वारा उठाया गया था। याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर जोर दिया:
- इन्फॉर्म्ड-कंसेंट प्रोटोकॉल: टीकाकरण से पहले अभिभावकों और प्रतिभागियों को जोखिमों के बारे में पूरी जानकारी देने के लिए अधिक सख्त नियमों की जरूरत है।
- मुआवजा तंत्र: टीकाकरण के बाद अगर कोई समस्या आती है, तो उसके लिए एक समर्पित 'वैक्सीन इंजरी कंपनसेशन मैकेनिज्म' होना चाहिए, ताकि लोगों का भरोसा बना रहे।
सेक्टर पर क्या होगा असर?
भले ही कोर्ट ने प्रोग्राम को जारी रखने की अनुमति दे दी है, लेकिन निगरानी और मुआवजे के ढांचे पर चर्चा अभी भी जारी रहेगी। हेल्थकेयर सेक्टर और निवेशकों के लिए यह एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, क्योंकि सरकारी नीतियों का सीधा असर वैक्सीन निर्माताओं, जैसे कि Gardasil बनाने वाली कंपनियों पर पड़ता है। बाजार विश्लेषक अब इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि सरकार भविष्य में वैक्सीन सुरक्षा संचार और निगरानी प्रोटोकॉल को और कितना पारदर्शी बनाती है।
