हेल्थ एडवोकेसी ग्रुप्स की मांग के बाद हॉस्पिटल स्टॉक्स में दबाव देखा जा रहा है। सरकार से प्राइवेट अस्पतालों में इलाज और दवाओं के मार्जिन पर कैप लगाने की मांग की गई है, जिससे निवेशकों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
देश की बड़ी हॉस्पिटल चेन इस समय सरकारी सख्ती के घेरे में हैं। 'जन स्वास्थ्य अभियान' जैसे संगठनों ने सरकार से मांग की है कि प्राइवेट अस्पतालों में इलाज के खर्च और फार्मेसी के सामानों पर कड़े प्राइस कैप (Price Caps) लागू किए जाएं। 5 अक्टूबर 2026 को उठी इस मांग का मुख्य आधार यह है कि बड़े प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों का रोजाना का खर्च ₹60,000 से ₹78,000 के बीच पहुंच रहा है।
बाजार पर असर
इस खबर के बाद शेयर बाजार में लिस्टेड हॉस्पिटल कंपनियों के स्टॉक्स में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। पिछले कुछ ट्रेडिंग सेशंस में इन शेयर्स में 4-6% तक की गिरावट आई है। निवेशकों को डर है कि अगर सरकार ने रेगुलेटरी इंटरवेंशन किया, तो अस्पतालों के प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ सकता है।
कमाई के मॉडल पर सवाल
दरअसल, बड़ी हॉस्पिटल चेन अपनी कमाई के लिए काफी हद तक फार्मेसी सेल्स और मेडिकल कंज्यूमेबल्स के हाई-मार्जिन पर निर्भर रहती हैं, जो उनके इंफ्रास्ट्रक्चर के भारी खर्चों (CAPEX) को कवर करता है। अब सुप्रीम कोर्ट भी दवाओं की कीमतों को लेकर सुनवाई कर रहा है। कोर्ट इस बात की जांच कर रहा है कि 'ड्रग्स (प्राइसेस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013' के तहत मिलने वाली 16% की रिटेल मार्जिन सीमा को अन्य दवाओं और अस्पतालों में बिकने वाले सामानों पर भी लागू किया जाना चाहिए या नहीं।
आगे क्या होगा?
शेयरधारकों के लिए असली रिस्क यह है कि अगर सरकार ने प्रोसीजर की लागत सीमित कर दी या मरीजों को बाहर से सस्ती दवाएं खरीदने की अनुमति दे दी, तो अस्पतालों का सबसे बड़ा रेवेन्यू सोर्स प्रभावित होगा। फिलहाल, निवेशकों की नजर 12 अक्टूबर 2026 को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी है। बाजार यह देखना चाहेगा कि सरकार का रुख कितना सख्त या उदार रहता है।
