भारत में कंपनियों के लिए कर्मचारी स्वास्थ्य खर्च एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। MediBuddy और CII की एक नई रिपोर्ट बताती है कि जो कर्मचारी सालाना हेल्थ चेक-अप नहीं कराते, वे कुल बीमा भुगतानों का **43%** हिस्सा हैं।
स्वास्थ्य जांच से कैसे बचता है पैसा?
डिजिटल हेल्थकेयर कंपनी MediBuddy और कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) की 'वर्कप्लेस हेल्थ रीइमेजिन्ड' (Workplace Health Reimagined) नाम की रिपोर्ट में 10,500 से अधिक कर्मचारियों के हेल्थ डेटा का विश्लेषण किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, जो कर्मचारी साल में तीन बार हेल्थ चेक-अप कराते हैं, उनमें हॉस्पिटलाइजेशन यानी अस्पताल में भर्ती होने की दर सिर्फ 2.41% है। वहीं, जो लोग बिल्कुल भी जांच नहीं कराते, उनमें यह दर बढ़कर 7.27% तक पहुंच जाती है।
यह अंतर कंपनियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह पाया गया है कि 25% ऐसे कर्मचारी, जिन्होंने कभी जांच नहीं कराई, उन्होंने कुल इनपेशेंट हॉस्पिटलाइजेशन क्लेम का 46% और कुल बीमा भुगतानों का 43% हिस्सा कवर किया। इसका मतलब है कि बीमारियों की रोकथाम न होने से कंपनियों के बीमा प्रीमियम और स्वास्थ्य खर्चों में भारी बढ़ोतरी हो रही है।
स्वास्थ्य प्रबंधन में कहां चूक?
कॉर्पोरेट वेलनेस प्रोग्राम होने के बावजूद, 52% कर्मचारी अपने हेल्थ चेक-अप के नतीजे आने के बाद कोई खास कदम नहीं उठाते। इसकी मुख्य वजह पर्सनलाइज्ड गाइडेंस और समय पर मेडिकल फॉलो-अप की कमी है।
इसके अलावा, कार्डियोवैस्कुलर (हृदय संबंधी) बीमारियों का बोझ भी काफी बढ़ा है, जो फार्मेसी खर्च का 20% से ज्यादा है। खासतौर पर 30 से 40 साल की उम्र के प्रोफेशनल्स में अचानक होने वाली कार्डियक समस्याओं में बढ़ोतरी देखी गई है, जिसके लिए कंपनियों को विशेष स्वास्थ्य हस्तक्षेप की जरूरत पड़ सकती है।
अलग-अलग उम्र के कर्मचारियों के स्वास्थ्य जोखिम
रिपोर्ट में अलग-अलग जनरेशन के हिसाब से स्वास्थ्य समस्याओं को बांटा गया है:
- जेन Z (Gen Z): करीब 30% वर्कफोर्स का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनमें चिंता (Anxiety) का स्तर काफी ऊंचा है।
- मिलनियल्स (Millennials): वर्कफोर्स का सबसे बड़ा हिस्सा हैं और बर्नआउट व मेटाबोलिक बीमारियों से जूझ रहे हैं।
- जेन X (Gen X): खास हेल्थ ट्रांजिशन से गुजर रहे हैं और परिवार की देखभाल की जिम्मेदारियां भी संभाल रहे हैं।
- बेबी बूमर्स (Baby Boomers): क्रॉनिक बीमारियों के प्रबंधन की जरूरत होती है, जिससे प्रति व्यक्ति औसत मेडिकल क्लेम सबसे ज्यादा होता है।
कॉर्पोरेट वेलनेस का भविष्य
यह स्टडी संकेत देती है कि भविष्य में कंपनियों के लिए सिर्फ हेल्थ कैंप आयोजित करना काफी नहीं होगा। अब फोकस AI-संचालित और पर्सनलाइज्ड हेल्थकेयर मॉडल पर शिफ्ट हो रहा है, ताकि लंबे समय तक प्रोडक्टिविटी बनी रहे और मेडिकल खर्चों को कंट्रोल किया जा सके। आने वाले सालों में कंपनियां सिर्फ बीमारियों के इलाज पर ध्यान देने की बजाय, डेटा-आधारित और प्रोएक्टिव वेलनेस प्रोग्राम पर कितना जोर देती हैं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
