इलाज के खर्च में बड़ी राहत!
पश्चिमी देशों की इम्यूनोथेरेपी (Immunotherapy) दवाओं की भारी कीमत भारतीय परिवारों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय रही है। Keytruda जैसी दवा की एक शीशी ₹1-2 लाख तक आती है, वहीं Opdivo का खर्च ₹50,000 से ₹100,000 तक हो सकता है। सहायता कार्यक्रमों के बावजूद, सालाना इलाज का खर्च ₹10 लाख से भी अधिक हो सकता है, जिससे 34-84% मरीज भारी कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं। ऐसे में, चीन से विकसित विकल्प अब बाजार में लगभग ₹50,000 प्रति सेशन की दर पर उपलब्ध हो रहे हैं, जिससे सालाना खर्च अनुमानित ₹3.5-4.5 लाख तक आ गया है। यह लागत में भारी कमी ज्यादा से ज्यादा मरीजों को इलाज कराने में मदद करेगी।
भारतीय कंपनियों ने चीनी दवाओं से मिलाया हाथ
भारतीय फार्मा कंपनियां इस लागत लाभ (Cost Advantage) का फायदा उठाने के लिए चीन के साथ रणनीतिक गठजोड़ (Strategic Collaborations) कर रही हैं। Intas Pharmaceuticals ने Shanghai Henlius Biotech से लाइसेंस लेकर 'serplulizumab' को स्मॉल सेल लंग कैंसर के लिए लॉन्च किया है। Glenmark Pharmaceuticals ने Beigene से 'tesilizumab' और Jiangsu Hengrui से 'trastuzumab rezetecan' के साथ-साथ Jiangsu Hansoh से 'aumolertinib' के लिए डील की है। वहीं, Dr. Reddy's Laboratories ने Shanghai Junshi Biosciences के साथ मिलकर 'toripalimab' को नेसोफरीन्जियल कार्सिनोमा के इलाज के लिए बाजार में उतारा है। ये साझेदारियां (Alliances) लाखों मरीजों तक नई और किफायती दवाएं पहुंचाने के लिए अहम साबित हो रही हैं।
डॉक्टर बोले - क्वालिटी ठीक, मरीजों को मिलेगा फायदा
चीन से आ रही दवाओं की गुणवत्ता (Quality) और उपयुक्तता (Suitability) को लेकर कुछ शुरुआती चिंताएं थीं, लेकिन अब भारत के कैंसर विशेषज्ञ (Oncologists) इन थेरेपी की प्रभावशीलता (Efficacy) पर मुहर लगा रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि ये दवाएं स्टैंडर्ड क्लिनिकल ट्रायल से गुजरी हैं और पश्चिमी दवाओं के मुकाबले इनकी रिस्पॉन्स रेट (Response Rate), प्रोग्रेशन-फ्री सर्वाइवल (Progression-Free Survival) और ओवरऑल सर्वाइवल (Overall Survival) की दरें भी तुलनीय (Comparable) पाई गई हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले एक दशक में, कैंसर, डायबिटीज और वेट लॉस जैसे विभिन्न चिकित्सीय क्षेत्रों में एशियाई दवाएं अमेरिकी और यूरोपीय उत्पादों की जगह ले सकती हैं।
