CDSCO ने अब सभी एस्थेटिक इंजेक्टेबल्स को कॉस्मेटिक्स के बजाय 'ड्रग्स' के दायरे में लाने का सख्त आदेश दिया है। इस फैसले से कंपनियों के लिए अब कड़े सुरक्षा और टेस्टिंग मानकों का पालन करना अनिवार्य हो गया है।
नियम क्यों बदले गए?
अब तक कई कंपनियां अपने इंजेक्टेबल प्रोडक्ट्स को 'टॉपिकल कॉस्मेटिक' बताकर कड़े रेगुलेटरी नियमों से बच निकलती थीं। CDSCO के इस नए आदेश के बाद, अब कोई भी प्रोडक्ट जो इंजेक्शन के जरिए शरीर में दिया जाता है, उसे ड्रग्स (दवा) की तरह ही जांचा और परखा जाएगा। इससे कंपनियों के लिए अब क्लीनिकल ट्रायल और क्वालिटी कंट्रोल पर भारी खर्च करना अनिवार्य हो गया है।
कंपनियों और मार्जिन पर असर
यह कदम बाजार में एक 'एंट्री बैरियर' की तरह है। जो कंपनियां पहले कम लागत में कॉस्मेटिक रूट अपनाकर बाजार में थीं, उन्हें अब नए सिरे से अप्रूवल लेने होंगे। इससे कंपनियों का ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर उनके प्रॉफिट मार्जिन पर देखने को मिल सकता है। हालांकि, बड़ी और स्थापित फार्मा कंपनियां, जिनके पास पहले से ही मजबूत रेगुलेटरी ढांचा है, उन्हें इस बदलाव से लॉन्ग-टर्म में फायदा हो सकता है।
क्लिनिक और सैलून इंडस्ट्री के लिए नई गाइडलाइन्स
सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग ही नहीं, बल्कि इस्तेमाल पर भी सख्ती बरती गई है। अब से केवल रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर्स (RMP), जैसे डर्मेटोलॉजिस्ट और प्लास्टिक सर्जन ही इन इंजेक्टेबल्स का इस्तेमाल कर पाएंगे। सैलून और स्पा में अप्रशिक्षित लोगों द्वारा किए जाने वाले इंजेक्शन के कारण बढ़ रही गंभीर जटिलताओं को देखते हुए यह फैसला लिया गया है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
इन्वेस्टर्स के लिए फिलहाल 'वॉच एंड वेट' की स्थिति है। जो कंपनियां पूरी तरह से कॉस्मेटिक-ग्रेड इंजेक्टेबल्स पर निर्भर थीं, उनके रेवेन्यू में शॉर्ट-टर्म गिरावट आ सकती है। निवेशक कंपनी की मैनेजमेंट कमेंट्री पर नजर रखें कि उनके पोर्टफोलियो में से कितने प्रोडक्ट्स का 'ड्रग्स' कैटेगरी में री-क्लासिफिकेशन हुआ है और उसकी लागत का मुनाफे पर कितना असर पड़ेगा। साथ ही, इंडस्ट्री में कंसोलिडेशन की भी संभावना है, जहां छोटे प्लेयर्स के लिए इन नियमों को मानना मुश्किल होगा।
