देश के ड्रग रेगुलेटर CDSCO ने एंटीबायोटिक्स और पेनकिलर्स की बिक्री को लेकर नियमों को सख्त कर दिया है। सेल्फ-मेडिकेशन पर लगाम लगाने के लिए अब बिना डॉक्टर की पर्ची के दवाएं नहीं मिलेंगी। इसका सीधा असर फार्मा कंपनियों की सेल्स वॉल्यूम और रिटेल फार्मेसी चेन के बिजनेस पर पड़ सकता है।
सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (CDSCO) ने पेनकिलर्स (NSAIDs) और एंटीबायोटिक्स की बिक्री को लेकर एक बेहद कड़ा एडवाइजरी जारी किया है। रेगुलेटर का जोर अब शेड्यूल H और H1 कैटेगरी की दवाओं पर है, जिन्हें बिना वैलिड मेडिकल डॉक्यूमेंट के बेचना अब लगभग नामुमकिन होगा। इस कदम का मुख्य मकसद एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस और किडनी से जुड़ी बीमारियों जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को कम करना है।
फार्मा मार्केट का गणित
इन्वेस्टर्स की नजर इस बात पर है कि यह रेगुलेटरी बदलाव फार्मा कंपनियों की कमाई पर कितना असर डालेगा। डेटा के मुताबिक, भारत का एंटीबायोटिक्स मार्केट अगस्त 2022 में ₹23,045 करोड़ का था, जो अगस्त 2026 तक बढ़कर ₹28,513 करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है। पिछले 5 सालों में इस सेक्टर में 5% की सीएजीआर (CAGR) ग्रोथ देखी गई है। अब नए नियमों के कारण उन दवाओं की बिक्री पर असर पड़ सकता है जो पहले बिना किसी पर्ची के आसानी से मिल जाती थीं।
रिटेलर्स और कंपनियों के लिए चुनौतियां
फार्मेसी चेन और रिटेलर्स पर अब नियमों का पालन कराने का भारी दबाव होगा। छोटी सी भी चूक या डॉक्यूमेंटेशन में कमी होने पर उन पर एडमिनिस्ट्रेटिव स्क्रूटनी हो सकती है। फार्मा कंपनियों के लिए चुनौती अब अपने वॉल्यूम ग्रोथ को बनाए रखने की होगी, खासकर उन सेगमेंट्स में जहाँ लोग खुद ही दवाएं खरीद लेते थे।
अगले कुछ महीनों में कंपनियों के अर्निंग्स रिपोर्ट्स में यह साफ हो पाएगा कि इस रेगुलेटरी बदलाव से उनके सेल्स मिक्स और कंप्लायंस कॉस्ट पर कितना असर पड़ा है। मार्केट के जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में फार्मा सेक्टर का पूरा डिमांड मॉडल 'प्रिस्क्रिप्शन-लेड' यानी डॉक्टर की पर्ची पर आधारित होने वाला है, जिससे कंपनियों के मुनाफे पर असर दिख सकता है।
