Bombay High Court का बड़ा फैसला! कोर्ट ने 10 अप्रैल, 2026 को स्पष्ट किया है कि ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 (DPCO 2013) के तहत मूल्य नियंत्रण (price ceilings) केवल उन्हीं फॉर्मूलेशन पर लागू होंगे जो सीधे तौर पर इस ऑर्डर की पहली अनुसूची में शामिल हैं। इसका मतलब है कि सस्टेन्ड-रिलीज (SR) और कंट्रोल्ड-रिलीज (CR) जैसे एडवांस्ड डिलीवरी सिस्टम वाली दवाएं, यदि विशेष रूप से लिस्ट में नहीं हैं, तो वे NPPA (National Pharmaceutical Pricing Authority) के प्राइस रेगुलेशन से बाहर रहेंगी।
यह फैसला दवा कंपनियों, खासकर Franco Indian Pharmaceuticals जैसी फर्मों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। Franco Indian Pharmaceuticals का फाइनेंशियल ईयर 25 (FY25) का रेवेन्यू ₹1,020 करोड़ रहा है। यह न्यायिक निर्णय फार्मा इंडस्ट्री की लंबे समय से चली आ रही मांग को पूरा करता है, जो इनोवेशन वाली डोज़ेज़ फॉर्म्स (dosage forms) के लिए ज़्यादा फ्लेक्सिबिलिटी चाहती थी। इंडस्ट्री का तर्क है कि SR, CR और मॉडिफाइड-रिलीज (MR) फॉर्मूलेशन अपने थेरेप्यूटिक फायदों के कारण स्टैंडर्ड दवाओं से अलग कीमत रखने के लायक हैं।
ऐतिहासिक रूप से, भारत की प्राइस कंट्रोल पॉलिसी ने affordability और कंपनियों के सस्टेनेबल ऑपरेशन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। NLEM (National List of Essential Medicines) दवाओं के लिए सालाना प्राइस एडजस्टमेंट WPI (Wholesale Price Index) से जुड़े हैं, जबकि नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं पर 10% का सालाना कैप है। हालांकि, एडवांस्ड फॉर्मूलेशन को प्राइस लिमिट से बाहर रखने से एक मार्केट-ड्रिवन प्राइसिंग सेगमेंट बन सकता है। पिछली स्टडीज़ बताती हैं कि कंपनियां कभी-कभी कंट्रोल्ड दवाओं पर कम मुनाफा होने के कारण अनरेगुलेटेड मेडिसिन की ओर रुख कर लेती हैं।
हालांकि, पब्लिक हेल्थ एक्टिविस्ट्स ने इस फैसले पर चिंता जताई है। एक्सेस टू मेडिसिन्स एंड ट्रीटमेंट ग्रुप के को-कन्वीनर, K.M. Gopakumar ने कहा कि यह रूलिंग DPCO 2013 में संभावित लूपहोल्स को उजागर करती है। चिंता यह है कि बड़ी कंपनियां नई दवा वेरिएंट्स को विकसित करके प्राइस कंट्रोल से बचने के तरीके ढूंढ सकती हैं। इससे एडवांस्ड फॉर्मूलेशन काफी महंगी हो सकती हैं, जिससे उन मरीजों के लिए बाधाएं खड़ी होंगी जिन्हें बेहतर डिलीवरी की जरूरत है लेकिन वे ज़्यादा कीमत नहीं दे सकते।
कोर्ट के इस फैसले से सरकार को संभावित रेगुलेटरी गैप्स को दूर करने की जरूरत महसूस हो सकती है। एक राय यह भी बन रही है कि DPCO 2013 में संशोधन की आवश्यकता हो सकती है ताकि NLEM में लिस्टेड सभी मॉलिक्यूल्स प्रभावी ढंग से प्राइस-कंट्रोल्ड रहें, चाहे उनका डिलीवरी सिस्टम कुछ भी हो। सरकार का NLEM का विस्तार करने और प्राइस रेगुलेशन को मजबूत करने का प्रयास affordability के प्रति प्रतिबद्धता दिखाता है। हालांकि, इनोवेशन को रोके बिना एडवांस्ड, नॉन-शेड्यूल्ड फॉर्मूलेशन को रेगुलेट करने का रास्ता खोजना एक जटिल चुनौती है।