बेंगलुरु की एक प्राइवेट स्टार्टअप Dognosis, प्रशिक्षित कुत्तों और AI सेंसर का इस्तेमाल करके कैंसर की नॉन-इनवेसिव स्क्रीनिंग सेवा विकसित कर रही है। फेज 2 क्लिनिकल ट्रायल के नतीजों में करीब 90% संवेदनशीलता (sensitivity) देखी गई है, और अब कंपनी बड़े पैमाने पर फेज 3 का अध्ययन कर रही है। यह इनोवेशन भारत में कैंसर के शुरुआती पहचान में आ रही कमी को दूर करने के लिए बायोटेक्नोलॉजी के बढ़ते उपयोग को दर्शाता है।
AI और कुत्तों का कमाल, कैंसर की करेगी पहचान!
बेंगलुरु की एक स्टार्टअप, Dognosis, कैंसर के शुरुआती पहचान में आ रही मुश्किलों को दूर करने के लिए एक अनोखा तरीका अपना रही है। कंपनी ने एक ऐसी विधि विकसित की है जहाँ प्रशिक्षित कुत्ते इंसानी सांस के सैंपल से कैंसर से जुड़े मार्कर का पता लगाते हैं। इस प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का भी इस्तेमाल किया जाता है। यह तकनीक अभी ट्रायल फेज में है और इसका मकसद एक ऐसी नॉन-इनवेसिव स्क्रीनिंग टूल बनाना है जो मौजूदा तरीकों से पहले ही बीमारी का पता लगा सके।
कुत्तों की सूंघने की शक्ति और AI का मेल
इस टेक्नोलॉजी का मुख्य आधार खास नस्ल के कुत्तों की तेज सूंघने की क्षमता है। मरीज एक खास मास्क में सांस लेते हैं, और इन सैंपल्स को कंपनी की फैसिलिटी में कुत्तों की टीम द्वारा जांचा जाता है। साथ ही, AI सेंसर कुत्तों के व्यवहार, शारीरिक और न्यूरल प्रतिक्रियाओं को ट्रैक करते हैं। कंपनी इस डेटा का इस्तेमाल करके कैंसर मार्कर की पहचान करती है, जिससे बायोप्सी या इमेजिंग टेस्ट जैसी इनवेसिव प्रक्रियाओं की शुरुआती स्क्रीनिंग में जरूरत नहीं पड़ती।
क्लिनिकल ट्रायल के नतीजे
'Journal of Clinical Oncology' में प्रकाशित फेज 2 ट्रायल, जिसमें 1,500 से ज्यादा मरीज शामिल थे, के सफल नतीजों के बाद कंपनी ने शुरुआती स्टेज के कैंसर का पता लगाने में लगभग 90% से 91% तक की संवेदनशीलता (sensitivity) और स्पेसिफिसिटी (specificity) दर्ज की है। अब Dognosis एक बड़े फेज 3 ट्रायल की तैयारी कर रही है। इस स्टडी में भारत के 10 अस्पतालों में 10,000 मरीजों को शामिल करने का लक्ष्य है, ताकि अलग-अलग ग्रुप्स में सिस्टम की प्रभावशीलता को परखा जा सके।
भविष्य की राह और चुनौतियां
Dognosis एक प्राइवेट कंपनी है और किसी भी स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड नहीं है। कंपनी ने Accel India और Boost VC जैसी वेंचर कैपिटल फर्मों से करीब $2 मिलियन का फंड जुटाया है। निवेशकों और हेल्थकेयर सेक्टर के लिए, इस तकनीक में एक किफायती और बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग टूल बनने की क्षमता है। हालांकि, कंपनी के सामने कई बड़ी ऑपरेशनल और साइंटिफिक चुनौतियां हैं। इस मॉडल को स्केल करने के लिए कुत्तों की टीम को लगातार और उच्च-गुणवत्ता वाली ट्रेनिंग की आवश्यकता होगी, जो ऑटोमेटेड लैब टेस्टिंग की तुलना में काफी जटिल है।
मेडिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसे स्क्रीनिंग तरीकों को मौजूदा डायग्नोस्टिक प्रोटोकॉल का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक (complement) होना चाहिए। रेगुलेटरी अप्रूवल और मौजूदा हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर में इसका एकीकरण महत्वपूर्ण होगा। कंपनी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह AI-कुत्ते मॉडल की विश्वसनीयता साबित कर पाती है या नहीं और क्या यह बिना किसी अनावश्यक फॉल्स पॉजिटिव या नेगेटिव के जल्दी निदान में मदद कर सकता है। अब सबकी निगाहें फेज 3 क्लिनिकल ट्रायल के नतीजों पर टिकी हैं।
