1,200 लोगों पर हुए **24** हफ्तों के एक बड़े क्लिनिकल ट्रायल में यह पुष्टि हुई है कि स्टैंडर्डाइज्ड अश्वगंधा रूट एक्सट्रैक्ट लिवर और किडनी के लिए पूरी तरह सुरक्षित है। यह वैज्ञानिक प्रमाण भारतीय हर्बल उत्पादों के ग्लोबल एक्सपोर्ट में एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
इस हालिया शोध ने अश्वगंधा की सुरक्षा पर उठ रहे सवालों पर विराम लगा दिया है। भारत में 7 अलग-अलग केंद्रों पर 1,200 स्वस्थ वयस्कों पर 24 हफ्तों तक चले इस ट्रायल में यह पाया गया कि 500 mg का स्टैंडर्डाइज्ड एक्सट्रैक्ट लेने से लिवर और किडनी पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। शोधकर्ताओं ने लिवर एंजाइम, बिलीरुबिन और क्रिएटिनिन जैसे जरूरी बायोलॉजिकल मार्कर्स को ट्रैक किया, जो पूरी अवधि के दौरान सामान्य स्तर पर बने रहे।
कोविशील्ड के साथ असर
ट्रायल में इस बात की भी जांच की गई कि क्या यह सप्लीमेंट कोविशील्ड वैक्सीन के साथ सुरक्षित है। रिसर्च में सामने आया कि अश्वगंधा लेने वाले और प्लेसबो ग्रुप के बीच वायरस-न्यूट्रलाइजिंग एक्टिविटी में कोई खास फर्क नहीं था, जो उन लोगों के लिए अच्छी खबर है जो वैक्सीन और हर्बल उत्पादों के रिएक्शन को लेकर चिंतित रहते हैं।
आयुर्वेद सेक्टर के लिए क्या हैं मायने?
अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे कड़े रेगुलेटेड बाजारों में प्रवेश करने के लिए भारतीय आयुर्वेद कंपनियों को अक्सर ठोस डेटा की कमी का सामना करना पड़ता है। आयुष मंत्रालय (Ministry of Ayush) भी अब एविडेंस-बेस्ड रिसर्च पर जोर दे रहा है, जिससे पारंपरिक चिकित्सा और आधुनिक हेल्थकेयर के बीच की खाई कम हो रही है।
हालांकि, निवेशकों को यह याद रखना चाहिए कि यह सुरक्षा रिपोर्ट केवल 'स्टैंडर्डाइज्ड' एक्सट्रैक्ट्स के लिए है। बाजार में मौजूद हर हर्बल उत्पाद की क्वालिटी एक जैसी नहीं होती। अब कंपनियों के लिए असली चुनौती अपनी मैन्युफैक्चरिंग में पारदर्शिता और क्वालिटी स्टैंडर्ड्स बनाए रखना है, ताकि असंगठित बाजार से अलग अपनी पहचान बनाई जा सके।
