एक नई रिसर्च स्टडी ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं! दिल्ली से होकर बहने वाली यमुना नदी पिछले 227 सालों में न सिर्फ **68%** संकरी हुई है, बल्कि इसके पानी के बहाव में भी भारी कमी आई है। पानी का फ्लो **89%** तक घट गया है।
शहरीकरण और इन्फ्रास्ट्रक्चर का असर
'Two Centuries of Hydrogeomorphic Changes: Width-Discharge Dynamics of the Urbanised Yamuna River in Delhi' नाम की इस रिसर्च में दिल्ली यूनिवर्सिटी और IISER भोपाल के वैज्ञानिकों ने 1799 के पुराने नक्शों की तुलना आज की सैटेलाइट इमेजरी से की।
स्टडी के मुताबिक, 1799 में यमुना नदी की औसत चौड़ाई जहां लगभग 658 मीटर थी, वहीं 2024 में यह घटकर सिर्फ 210 मीटर रह गई है। यानी, नदी 68% सिकुड़ गई है। पानी के डिस्चार्ज में भी जबरदस्त गिरावट आई है, जो करीब 30,000 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड से घटकर लगभग 3,900 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड पर आ गया है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव पिछले दो सदियों से चल रहे इंसानी दखल का नतीजा है। नदी पर बने तटबंध, नहरें और बैराज (जैसे 1873 में ताजेवाला, 1874 में ओखला, 1959 में वजीराबाद और 1960 के दशक के अंत में ITO बैराज) ने नदी के प्राकृतिक बहाव को पूरी तरह बदल दिया है। इन बैराजों से पानी को डायवर्ट करके दिल्ली की बढ़ती आबादी (जो 19वीं सदी की शुरुआत में 2.5 लाख थी, आज 2.15 करोड़ से ज्यादा है) की प्यास बुझाई जा रही है।
इसके अलावा, नदी के बाढ़ वाले मैदान (floodplain) के करीब 45 वर्ग किलोमीटर इलाके को शहरी विकास और खेती के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है। इससे नदी का अपने बाढ़ के पानी को सोखने वाला प्राकृतिक इलाका खत्म हो गया है। नदी एक तंग चैनल में सिमट गई है, जिससे बाढ़ के पानी को फैलने और नियंत्रित होने की जगह नहीं मिल पा रही है।
बाढ़ प्रबंधन पर सीधा असर
यह स्टडी यह भी बताती है कि मानसून के दौरान नदी शहर के लिए कितना बड़ा खतरा बन गई है। 2023 की दिल्ली बाढ़ इसका जीता-जागता सबूत है। रिसर्च के अनुसार, 1978 की भयानक बाढ़ की तुलना में 2023 में ऊपर से पानी का रिलीज कम होने के बावजूद, नदी का जलस्तर काफी ज्यादा बढ़ गया था। यह दिखाता है कि नदी के संकरे होने और बाढ़ के मैदानों के खत्म होने से शहर अब पानी के तेज बहाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो गया है। अर्बन प्लानिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े लोगों के लिए यह एक चेतावनी है कि नदी के किनारे भविष्य की योजनाओं में ड्रेनेज, फ्लड मैनेजमेंट और पर्यावरण की स्थिरता पर ज्यादा ध्यान देना होगा।
