Urban Greening: जंगलों से निकलकर सड़कों पर आ रही हरियाली, गर्मी से मिलेगी राहत!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Urban Greening: जंगलों से निकलकर सड़कों पर आ रही हरियाली, गर्मी से मिलेगी राहत!

भारतीय शहर अब सिर्फ जंगलों में पेड़ लगाने की बजाय सड़कों और फुटपाथों पर भी हरियाली बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। इसका मकसद बढ़ता तापमान और गर्मी से आम नागरिकों को राहत पहुंचाना है। जहां पहले बड़े पैमाने पर 'न.गर वन योजना' जैसे सरकारी अभियान जंगलों पर केंद्रित थे, वहीं अब विशेषज्ञों की मानें तो पैदल चलने वालों और स्ट्रीट वेंडर्स को सीधा फायदा पहुंचाने के लिए सड़कों पर छायादार पेड़ लगाना ज़रूरी है।

गर्मी से राहत के लिए नई राह

बढ़ते तापमान और पर्यावरण के दबाव के बीच भारतीय शहर अब शहरी हरियाली (Urban Greening) पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। दिल्ली में 1 करोड़ पौधे लगाने के लक्ष्य और वाराणसी में हाल ही में 2.5 लाख पौधे लगाने जैसे बड़े पैमाने के प्रयासों के बावजूद, अब इस बात पर ज़ोर दिया जा रहा है कि ये पेड़ रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लोगों को कैसे राहत पहुंचाएं। केंद्र सरकार की 'न.गर वन योजना' के तहत 400 न.गर वन और 200 न.गर वाटिका बनाने का काम जारी है, लेकिन अब फोकस सड़कों पर है।

सिर्फ जंगल नहीं, सड़कों पर भी छाया

विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े पैमाने पर पेड़ लगाना भले ही जैव विविधता (Biodiversity) के लिए अच्छा हो, लेकिन इससे उन लोगों को गर्मी से सीधी राहत नहीं मिलती जो घनी आबादी वाले इलाकों में रहते हैं। अब जोर सड़कों, फुटपाथों और बाजारों में हरियाली लाने पर है। वैज्ञानिक तौर पर, पेड़ वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) के ज़रिए आसपास के तापमान को 2.8 डिग्री सेल्सियस तक कम कर सकते हैं। इससे भी बढ़कर, वे सीधी धूप को रोककर छाया प्रदान करते हैं, जो गर्मियों में 900 वॉट प्रति वर्ग मीटर से भी ज़्यादा हो सकती है। कंक्रीट और डामर (Asphalt) को गर्म होने से रोककर, छायादार रास्ते सतह के तापमान को 6 से 8 डिग्री सेल्सियस तक कम कर सकते हैं। इससे स्ट्रीट वेंडर्स, डिलीवरी वर्कर्स और पैदल चलने वालों को सीधा फायदा होगा।

इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियां

इस रणनीति को लागू करना सिर्फ पौधे लगाने से कहीं ज़्यादा है। मौजूदा शहरी डिज़ाइन में अक्सर सड़कों के बीचों-बीच (Medians) पेड़ लगाए जाते हैं, जो देखने में अच्छे लगते हैं लेकिन फुटपाथ पर चलने वालों को छाया नहीं देते। यह एक बड़ी चुनौती है जिस पर शहरी नियोजकों (Municipal Planners) को ध्यान देना होगा। इसके अलावा, पेड़ों का रखरखाव (Maintenance) भी एक बड़ी समस्या है। दिल्ली की 2020 की 'ट्री ट्रांसप्लांटेशन पॉलिसी' जैसी नीतियां बड़ी सड़कों के आसपास हरे कवर को बचाने का लक्ष्य रखती हैं, लेकिन ये संकरी गलियों तक नहीं पहुंच पातीं जहां छाया की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।

नियम और रखरखाव पर प्राथमिकता

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2026 में 'पैदल चलने के अधिकार' (Right to Walk) को मान्यता देना, आरामदायक पैदल यात्री बुनियादी ढांचे की ज़रूरत को और मज़बूत करता है। इससे नगर निकायों पर हरे कवर के नियमों को सख्ती से लागू करने का दबाव बढ़ेगा। शहरी बुनियादी ढांचे पर नज़र रखने वाले निवेशकों के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शहर टिकाऊ वृक्षारोपण प्रथाओं को अपनाते हैं या नहीं। इसमें पेड़ों के लिए पर्याप्त जगह सुनिश्चित करना, उनकी जड़ों के स्वास्थ्य के लिए पारगम्य फुटपाथ (Permeable Paving) का उपयोग करना और तूफानों या पुराने पेड़ों के गिरने से नष्ट हुए पेड़ों के बदले में अनिवार्य रोपण (Mandatory Replacement Planting) को लागू करना शामिल है। यह समस्या मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में लगातार बनी हुई है। जवाबदेही नियमित पेड़ गणना (Tree Census) और उन्हें बदलने के कार्यक्रमों से जोड़ने पर निर्भर करेगी, जो कि अस्थायी वृक्षारोपण अभियानों के बजाय शहरी जलवायु अनुकूलन (Urban Climate Adaptation) की ओर एक दीर्घकालिक कदम होगा।

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