ग्लोबल '30-by-30' बायोडायवर्सिटी प्लान में **$150 बिलियन** तक की फंडिंग की कमी देखी जा रही है। इस सुस्त रफ्तार के कारण भविष्य में भारत में पर्यावरण संबंधी नियम और सख्त हो सकते हैं, जिसका असर माइनिंग, एग्री और फॉरेस्ट्री सेक्टर की कंपनियों पर पड़ेगा।
दुनिया भर में 30 प्रतिशत जमीन और समुद्री इलाकों को 2030 तक सुरक्षित करने का महत्वाकांक्षी '30-by-30' इनिशिएटिव फिलहाल अपनी रफ्तार खोता दिख रहा है। हालिया डेटा के मुताबिक, जमीन का लक्ष्य 20 प्रतिशत और समुद्र का लक्ष्य सिर्फ 10 प्रतिशत ही पूरा हो पाया है। यह देरी अब ग्लोबल इंडस्ट्रीज के लिए एक बड़ा फाइनेंशियल और ऑपरेशनल रिस्क बनती जा रही है।
फंडिंग का संकट
इस संकट की सबसे बड़ी वजह $75 बिलियन से $150 बिलियन सालाना की फंडिंग गैप है। केवल 3.5 प्रतिशत समुद्री क्षेत्र ही प्रभावी रूप से मैनेज किए जा रहे हैं, जिसका मतलब है कि अधिकांश सुरक्षा कागजों तक ही सीमित है। जैसे-जैसे UN की बायोडायवर्सिटी कन्वेंशन समीक्षा की तैयारी कर रही है, सरकारों पर सख्त कानून लागू करने का दबाव बढ़ता जा रहा है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?
भारत में एग्री, फॉरेस्ट्री, वाटर यूटिलिटीज और माइनिंग जैसी सेक्टर की कंपनियां सीधे तौर पर इकोसिस्टम पर निर्भर हैं। अगर ग्लोबल स्तर पर बायोडायवर्सिटी लॉस को रोकने में देरी होती है, तो भारतीय सरकार भविष्य में अधिक आक्रामक रेगुलेशन ला सकती है। इसमें नए बायोडायवर्सिटी टैक्स, सख्त लैंड-यूज़ नियम और अनिवार्य एनवायरनमेंटल रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट्स शामिल हो सकते हैं, जो कंपनियों की लागत बढ़ाएंगे।
SEBI और ESG का बढ़ता प्रभाव
SEBI पहले ही BRSR (Business Responsibility and Sustainability Report) के जरिए पारदर्शिता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। आने वाले समय में पेपर, एग्रोकेमिकल्स और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को अपनी सप्लाई चेन में कड़े ESG नियमों का पालन करना पड़ सकता है। निवेशकों को Ministry of Environment, Forest and Climate Change की गाइडलाइन्स और SEBI के सस्टेनेबिलिटी डिस्क्लोजर पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही तय करेंगे कि भारत इन ग्लोबल मानकों के साथ कैसे तालमेल बिठाता है।
