मीथेन लीक का 'अलार्मिंग' लेवल
Carbon Mapper और Stop Methane Project (SPM) द्वारा किए गए विश्लेषण से यह सामने आया है कि इन साइट्स से हर घंटे 3.7 से लेकर 10.5 मीट्रिक टन मीथेन गैस का उत्सर्जन हो रहा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि सिर्फ 5 टन प्रति घंटे की रफ्तार से लीक होने वाली मीथेन गैस का ग्लोबल वार्मिंग पर उतना ही असर है, जितना एक लाख बड़ी SUVs या 500 मेगावाट के कोयला पावर प्लांट का होता है।
मीथेन: एक खतरनाक ग्रीनहाउस गैस
मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) से कहीं ज़्यादा खतरनाक ग्रीनहाउस गैस है। भले ही यह वायुमंडल में CO2 जितने लंबे समय तक न रहे, लेकिन कम समय में यह गर्मी को कहीं ज़्यादा तेजी से पकड़ती है। अगले 20 सालों में, मीथेन, CO2 के मुकाबले 86 गुना ज़्यादा गर्मी सोख सकती है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के अनुसार, इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन के बाद से ग्लोबल टेम्परेचर में आई बढ़ोतरी का करीब 30% मीथेन की वजह से है, और अब वायुमंडल में इसका स्तर प्री-इंडस्ट्रियल लेवल से लगभग 2.5 गुना ज़्यादा है।
एनर्जी सेक्टर का बड़ा हाथ
IEA का अनुमान है कि 2024 में ही एनर्जी सेक्टर से 145 मिलियन टन मीथेन का उत्सर्जन हुआ, जिसमें से अकेले तेल और गैस ऑपरेशन्स से 80 मिलियन टन से ज़्यादा मीथेन निकली। एक्सपर्ट्स का मानना है कि तेल और गैस इंडस्ट्री से मीथेन उत्सर्जन को कम करना ग्लोबल वार्मिंग को धीमा करने का सबसे तेज़ और आसान तरीका है, क्योंकि इसके 70% से ज़्यादा उत्सर्जन को रोकने के लिए टेक्नोलॉजी मौजूद है।
मीथेन लीक के अन्य हॉटस्पॉट
तुर्कमेनिस्तान के अलावा, ईरान और वेनेज़ुएला में भी मीथेन लीक के बड़े स्रोत पाए गए हैं। अमेरिका के टेक्सास और पाकिस्तान के सिंध प्रांत में भी ऐसी साइट्स हैं। पहले की रिसर्च में दिल्ली के एक लैंडफिल को भी मीथेन का बड़ा सुपर-एमिटर बताया गया था, जहां अप्रैल 2022 में एक लीक से प्रति घंटे 400 टन से ज़्यादा मीथेन निकली थी, जो लगभग 6.8 करोड़ कारों के प्रदूषण के बराबर है। इन बड़ी लीकेज साइट्स पर तुरंत कार्रवाई करके ही जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में बड़ा असर डाला जा सकता है।