यूनिवर्सिटी ऑफ शेफील्ड की एक नई रिसर्च में चिंताजनक खुलासा हुआ है। साल 2001 से अब तक 40 लाख हेक्टेयर से ज़्यादा सुरक्षित उष्णकटिबंधीय जंगल (tropical forest) आग की भेंट चढ़ चुके हैं, और 2024 में तो स्थिति बेहद गंभीर हो गई है। इस विनाश का सीधा असर ग्लोबल सप्लाई चेन और कंपनियों के लिए ESG नियमों के पालन पर पड़ रहा है।
ग्लोबल सप्लाई चेन पर क्या होगा असर?
इस आग से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं ब्राजील, बोलीविया और इंडोनेशिया जैसे देश, जो दुनिया भर के लिए कॉफी, कोको, रबर और पाम ऑयल जैसे ज़रूरी सामानों के बड़े सप्लायर हैं। जब जंगल जलते हैं, तो इन ज़रूरी चीजों की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित होती है। इससे खाने-पीने और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कंपनियों के लिए माल की कमी हो सकती है, खरीद लागत बढ़ सकती है और तैयार माल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। FMCG और एग्री सेक्टर पर नज़र रखने वाले निवेशकों को ध्यान देना चाहिए कि इन इलाकों से पैदावार घटने का सीधा असर ग्लोबल मैन्युफैक्चरर्स की लागत पर पड़ेगा और महंगाई बढ़ेगी।
ESG नियमों का बढ़ता बोझ
जंगलों के इस तेज़ी से हो रहे नुकसान से कंपनियों पर रेगुलेटरी दबाव भी बढ़ गया है। कई देश और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं अब जंगलों को काटने से मुक्त सप्लाई चेन के नियम कड़े कर रही हैं। उदाहरण के लिए, यूरोपीय यूनियन का नया नियम (EUDR) कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उनके प्रोडक्ट (जैसे कॉफी, रबर, कोको) ऐसे किसी इलाके से नहीं आए हैं जिसे काटा गया हो।
आग लगने से रॉ मटेरियल की सोर्सिंग को वेरिफाई करना और भी मुश्किल हो गया है। ऐसे में, जो कंपनियां अपने सोर्सेस को लेकर इन सख्त पर्यावरण नियमों का पालन नहीं कर पाएंगी, वे बड़े एक्सपोर्ट मार्केट से बाहर हो सकती हैं। भारतीय एक्सपोर्टर्स और मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए यह एक बड़ा ऑपरेशनल खर्च और भविष्य की वित्तीय स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण फैक्टर बन गया है।
क्लाइमेट रिस्क अब बना आर्थिक चिंता
जंगलों का यह विनाश हमें 'क्लाइमेट फीडबैक लूप' की याद दिलाता है, जहां आग से निकलने वाला कार्बन वातावरण को और गर्म करता है, जिससे भविष्य में ऐसी आग लगने का खतरा बढ़ जाता है। इंश्योरेंस और री-इंश्योरेंस कंपनियों के लिए यह एक 'न्यू नॉर्मल' है, जहां क्लाइमेट से जुड़े नुकसान बढ़ रहे हैं। हालांकि, इस रिसर्च से सीधे तौर पर जुड़ा कोई स्टॉक मार्केट इंस्ट्रूमेंट नहीं है, लेकिन बीमा प्रीमियम में बढ़ोतरी, सप्लाई चेन में अस्थिरता और महंगी एडैप्टेशन स्ट्रेटेजी जैसे आर्थिक ट्रेंड्स पर निवेशकों को ध्यान देना चाहिए।
आगे देखना यह होगा कि बड़े एग्री प्रोड्यूसर अपनी जमीन प्रबंधन की स्ट्रेटेजी कैसे बदलते हैं और क्या कंज्यूमर फेसिंग कंपनियां हाई-रिस्क वाले इलाकों से अपनी सोर्सिंग को डाइवर्सिफाई करके जोखिम कम कर पाती हैं।
