आग का बढ़ता संकट
साल 2026 की शुरुआत में अब तक का सबसे ज़्यादा ज़मीन पर वाइल्डफायर देखा गया है, जो एक बड़े आर्थिक खतरे का संकेत है। अल नीनो (El Niño) के बढ़ते असर से ग्लोबल गर्मी और सूखा बढ़ रहा है, जिसका असर कमोडिटी मार्केट, सप्लाई चेन और कंपनियों के फाइनेंस पर दिख रहा है, जिससे महंगाई और बढ़ रही है।
जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच दुनिया भर में 150 मिलियन हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन जल चुकी है। यह पिछले औसत से 50% ज़्यादा है और 2020 में दर्ज पिछले रिकॉर्ड से 20% ऊपर है। अफ्रीका और एशिया सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए, जहां क्रमशः 85 मिलियन और 44 मिलियन हेक्टेयर ज़मीन आग की चपेट में आ गई। अमेरिका में भी बड़े पैमाने पर आग लगी, जिसकी वजह मार्च की हीटवेव थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी घटना की संभावना सात गुना बढ़ गई है। यह आग की बढ़ती घटनाओं का सिलसिला बढ़ते तापमान और बदलती बारिश के पैटर्न के बीच हो रहा है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अल नीनो की स्थिति इन हालात को और बिगाड़ सकती है, जिससे आग लगने वाले इलाकों का दायरा और स्वास्थ्य व अर्थव्यवस्था पर असर दोनों बढ़ सकते हैं।
अर्थव्यवस्था पर मुख्य असर
एग्रीकल्चर सेक्टर (Farm sector) खास तौर पर सबसे ज़्यादा असुरक्षित है। धुएं, गर्मी और सूखे की वजह से फसल की पैदावार कम हो रही है और खड़ी फसलें बर्बाद हो रही हैं। इन दिक्कतों का असर ग्लोबल फूड प्रोडक्शन के 75% तक पर पड़ सकता है। इंश्योरेंस कंपनियां दावों (claims) में अचानक बढ़ोतरी देख रही हैं, क्योंकि प्राकृतिक आपदाओं, जिनमें वाइल्डफायर शामिल हैं, से हुए नुकसान ने रिकॉर्ड स्तर छू लिया है। अकेले जनवरी 2025 में लॉस एंजेलिस की आग जैसी घटनाओं से इंश्योरेंस कंपनियों को करीब $40 बिलियन का नुकसान हुआ। इसके चलते प्रीमियम बढ़ रहे हैं और जोखिम वाले इलाकों में इंश्योरेंस कवरेज पर सवाल उठ रहे हैं। एक्सट्रीम वेदर (Extreme weather) एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को भी बाधित कर रहा है, जिससे कीमतों में उतार-चढ़ाव आ रहा है और कूलिंग की मांग बढ़ रही है, जो शायद ज़्यादा फॉसिल फ्यूल के इस्तेमाल की ओर ले जाए। कंपनियों ने सप्लाई चेन में बड़ी रुकावटों की रिपोर्ट दी है, जिसमें देरी, मटेरियल की कमी और क्षतिग्रस्त इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण शिपिंग लागत में बढ़ोतरी शामिल है।
फाइनेंशियल मार्केट के रिस्क
पिछले अल नीनो इवेंट्स वैश्विक अर्थव्यवस्था में ट्रिलियन डॉलर के नुकसान और कमोडिटी कीमतों व महंगाई में तेज उछाल से जुड़े रहे हैं। वर्तमान में वाइल्डफायर का यह बढ़ा हुआ सिलसिला, अल नीनो से और गंभीर हो गया है, सीधे तौर पर ग्लोबल महंगाई को बढ़ा रहा है। यह खाने की सप्लाई कम करके और लागत बढ़ाकर लोगों के बजट पर दबाव डाल रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि फाइनेंशियल मार्केट इन जलवायु जोखिमों (climate risks) को ठीक से नहीं आंक रहे हैं। ज़्यादातर फाइनेंस प्रोफेशनल्स को लगता है कि शेयर की कीमतों में जलवायु जोखिमों का असर नहीं दिख रहा है, जो संभावित मार्केट समस्याओं और अचानक बड़ी गिरावट की आशंका को बढ़ाता है। ये फिजिकल रिस्क उम्मीद से जल्दी और ज़्यादा गंभीर रूप से सामने आ रहे हैं।
आगे का नज़ारा: लगातार दबाव
वाइल्डफायर की बढ़ती फ्रीक्वेंसी और इंटेंसिटी, अल नीनो के बढ़ते असर के साथ मिलकर, मार्केट की स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा पैदा करती है। इंश्योरेंस इंडस्ट्री को लगातार भारी नुकसान का सामना करना पड़ेगा, जिससे कुछ इलाके इंश्योरेबल नहीं रह जाएंगे और जोखिम वाले क्षेत्रों में बिजनेस के लिए उधार लेना महंगा हो जाएगा। ग्लोबल सप्लाई चेन की आपसी निर्भरता का मतलब है कि स्थानीय आपदाएं बड़े पैमाने पर कमी और कीमतों में बढ़ोतरी का कारण बन सकती हैं, जिससे महंगाई बढ़ेगी और उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता कम होगी। फाइनेंशियल मार्केट, जो इन बढ़ते फिजिकल रिस्क को पूरी तरह से नहीं आंक रहे हैं, उन्हें अचानक और महत्वपूर्ण रीप्राइजिंग (repricing) का सामना करना पड़ सकता है, जैसे-जैसे असली आर्थिक प्रभाव स्पष्ट होगा। आपदा राहत और रिकवरी के कारण सरकारी बजट पर पड़ने वाला दबाव राष्ट्रीय कर्ज और वित्तीय अस्थिरता को बढ़ा सकता है, खासकर विकासशील देशों में जहां कवरेज कम है।
वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि एक मजबूत अल नीनो अभूतपूर्व चरम सीमाओं के साथ एक असाधारण रूप से गंभीर वाइल्डफायर सीजन का कारण बन सकता है। प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले इंश्योर्ड लॉस (insured losses) में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जो बढ़ते जोखिम और ज़्यादा गंभीर खतरों के कारण है। एडाप्टेशन (adaptation) और रिस्क रिडक्शन (risk reduction) के प्रयासों के बिना, वाइल्डफायर और अन्य जलवायु घटनाओं से जुड़ी लागतें संभवतः बढ़ती रहेंगी। यह कई सेक्टर्स की इंस्योरेबिलिटी (insurability) और वित्तीय सेहत के लिए खतरा पैदा करता है और व्यापक आर्थिक अस्थिरता का कारण बन सकता है। इन आर्थिक खतरों को कम करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से बदलाव और मजबूत जलवायु-लचीला इंफ्रास्ट्रक्चर (climate-resilient infrastructure) की तत्काल आवश्यकता है।
