गंगा में 'फॉरएवर केमिकल्स' का भारी प्रदूषण: उद्योगों पर कसेगा शिकंजा!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
गंगा में 'फॉरएवर केमिकल्स' का भारी प्रदूषण: उद्योगों पर कसेगा शिकंजा!

गंगा नदी में 'फॉरएवर केमिकल्स' (PFAS) के भारी प्रदूषण का खुलासा हुआ है। एक नई स्टडी बताती है कि मौजूदा टेस्ट इन खतरनाक केमिकल्स का सिर्फ 1% ही पकड़ पाते हैं। यह बड़ी छुपी हुई समस्या उद्योगों, खासकर केमिकल, टेक्सटाइल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है, क्योंकि सरकार कड़े नियम लागू कर सकती है।

क्या हुआ है?

हाल ही में 'एनवायरनमेंट इंटरनेशनल' जर्नल में छपी एक वैज्ञानिक स्टडी ने गंगा नदी को लेकर एक बड़ी पर्यावरणीय चिंता सामने लाई है। शोधकर्ताओं ने पाया कि मौजूदा टेस्टिंग के तरीके नदी के तलछट में मौजूद 'फॉरएवर केमिकल्स'—जिन्हें तकनीकी भाषा में पर- और पॉलीफ्लोरोएल्काइल सब्सटेंस (PFAS) कहते हैं—का केवल 1% ही पकड़ पाते हैं। इस स्टडी में उत्तराखंड में ऋषिकेश और रुड़की के बीच गंगा के 58 किलोमीटर लंबे हिस्से में 14 अलग-अलग जगहों से तलछट के सैंपल लिए गए थे।

खास विश्लेषण में कुछ जाने-पहचाने PFAS कंपाउंड्स की पहचान तो हुई, लेकिन एक्स्ट्रैक्टेबल ऑर्गेनिक फ्लोरीन (जो इन केमिकल्स का मार्कर है) की कुल मात्रा बहुत ज़्यादा निकली। नदी के निचले इलाकों में, इन पदार्थों की मात्रा ऋषिकेश के पास मिले स्तरों से लगभग 5 गुना ज़्यादा पाई गई। यह इस बात का संकेत है कि नदी के तलछट में बहुत सारे अज्ञात फ्लोरीन वाले पॉल्यूटेंट्स जमा हो रहे हैं।

उद्योगों के लिए यह क्यों मायने रखता है?

PFAS कंपाउंड्स इंसानों द्वारा बनाए गए ऐसे केमिकल्स हैं जिनका इस्तेमाल इंडस्ट्रियल प्रोसेस में बड़े पैमाने पर होता है, क्योंकि ये पानी, ग्रीस और गर्मी के प्रतिरोधी होते हैं। ये नॉन-स्टिक कुकवेयर, दाग-प्रतिरोधी कपड़ों, फूड पैकेजिंग और खास इंडस्ट्रियल कोटिंग्स के प्रोडक्शन में आम हैं। यह बात सामने आने के बाद कि गंगा नदी के तलछट में इन केमिकल्स की भारी मात्रा है, यह माना जा रहा है कि ये इंडस्ट्रियल वेस्टवाटर, एफ्लुएंट डिस्चार्ज या मैन्युफैक्चरिंग हब से निकलने वाले रन-ऑफ के ज़रिए इकोसिस्टम में जा रहे हैं।

इन्वेस्टर्स के लिए, यह स्टडी एक उभरते हुए पर्यावरणीय और ऑपरेशनल रिस्क को उजागर करती है। जैसे-जैसे इन केमिकल्स की मौजूदगी ज़्यादा जानी-पहचानी और साइंटिफिकली डॉक्यूमेंटेड होती जाएगी, वैसे-वैसे सरकारी जांच और कड़े एनवायरनमेंटल रेगुलेशंस की संभावना बढ़ेगी। जिन उद्योगों में इन केमिकल प्रोसेस का इस्तेमाल होता है, उन पर अपने एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट्स (ETPs) को अपग्रेड करने या सुरक्षित विकल्प अपनाने का दबाव आ सकता है, जिसका सीधा असर ऑपरेटिंग कॉस्ट और कैपिटल एक्सपेंडिचर पर पड़ सकता है।

कंप्लायंस और रेगुलेटरी रिस्क

ऐतिहासिक तौर पर, भारत की प्रमुख जल संस्थाओं में पर्यावरणीय प्रदूषण की घटनाओं के चलते अक्सर रेगुलेटरी एक्शन लिया जाता है। अगर सरकारी एजेंसियां इन 'फॉरएवर केमिकल्स' को कम करने को प्राथमिकता देती हैं, तो इससे गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे स्थित फैक्ट्रियों के लिए डिस्चार्ज के नियम और कड़े हो सकते हैं। केमिकल, टेक्सटाइल, लेदर और फूड प्रोसेसिंग सेक्टर की वे कंपनियां जो पानी की गुणवत्ता के बदलते मानकों का पालन नहीं करेंगी, उन्हें कानूनी चुनौतियों, अस्थायी बंदिशों या महंगे कंप्लायंस रेट्रोफिट्स का सामना करना पड़ सकता है।

इसके अलावा, PFAS से जुड़े लंबे समय के हेल्थ रिस्क—जिनमें थायराइड की समस्याएँ और इम्यून सिस्टम की दिक्कतें शामिल हैं—जनता में जागरूकता बढ़ा सकते हैं और उन कंपनियों के लिए मुकदमेबाजी का खतरा पैदा कर सकते हैं जिन्हें इस प्रदूषण का प्रमुख स्रोत माना जाता है।

'फॉरएवर केमिकल्स' को समझना

इन सब्सटेंस को 'फॉरएवर केमिकल्स' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनमें कार्बन-फ्लोरीन के मज़बूत बॉन्ड होते हैं, जो इन्हें प्राकृतिक वातावरण में तोड़ना बेहद मुश्किल बनाते हैं। ये मिट्टी और पानी में जमा हो जाते हैं और इंसानी खून में लंबे समय तक बने रह सकते हैं। स्टडी का यह निष्कर्ष कि 99% केमिकल पारंपरिक प्रोटोकॉल द्वारा अनडिटेक्टेड रह जाते हैं, यह बताता है कि प्रदूषण का असली पैमाना वर्तमान में कम आंका जा रहा है। इसके लिए भविष्य में और ज़्यादा एडवांस्ड और महंगी टेस्टिंग और फिल्ट्रेशन टेक्नोलॉजीज की ओर बढ़ना पड़ सकता है।

इन्वेस्टर्स क्या मॉनिटर कर सकते हैं?

गंगा बेसिन के पास ऑपरेशन करने वाली मैन्युफैक्चरिंग और केमिकल कंपनियों में इन्वेस्ट करने वाले इन्वेस्टर्स को निम्नलिखित बातों पर नज़र रखनी चाहिए: सेंट्रल पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) से PFAS या कड़े वेस्टवाटर स्टैंडर्ड्स को लेकर संभावित नीतिगत घोषणाएं, उस क्षेत्र में पानी की गुणवत्ता पर अपडेट्स की खबरें, और कंपनियों द्वारा अपने एफ्लुएंट ट्रीटमेंट क्षमताओं को सुधारने के लिए घोषित किसी भी कैपिटल स्पेंडिंग प्लान पर। इन क्षेत्रों की निगरानी से यह आंकने में मदद मिलेगी कि व्यवसाय कैसे ऐसे माहौल के लिए तैयार हो रहे हैं जहां एनवायरनमेंटल कंप्लायंस लगातार ज़्यादा सख्त होता जा रहा है।

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