नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई आपदा के बाद सुनीता नारायण ने मौजूदा इंजीनियरिंग मानकों पर कड़े सवाल उठाए हैं। यह चेतावनी इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के निवेशकों के लिए एक बड़ा संकेत है कि भविष्य में प्रोजेक्ट कॉस्ट और रिस्क मैनेजमेंट के नियम बदल सकते हैं।
नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्रों में चल रहे इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की महानिदेशक सुनीता नारायण ने इसे 'इंजीनियरिंग का अहंकार' (Engineering Hubris) करार दिया है। उनका तर्क है कि पारिस्थितिक संतुलन (Ecological boundaries) को नजरअंदाज कर किए जा रहे निर्माण कार्य भविष्य में बड़े ऑपरेशनल और सुरक्षा जोखिम पैदा कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्यों है यह चिंताजनक?
निवेशकों के लिए यह मामला केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर की वैल्यूएशन का है। हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में बन रहे रोड, ब्रिज, हाइड्रो-पावर प्लांट और ट्रांसमिशन लाइनें अब एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स की चपेट में हैं। अगर बिना क्लाइमेट रिस्क को ध्यान में रखे प्रोजेक्ट्स बनाए जाएंगे, तो एसेट फेलियर, लागत में बढ़ोतरी और प्रोजेक्ट में देरी का खतरा 100% बढ़ जाता है।
क्लाइमेट रेजिलिएंस अब मजबूरी
फाइनेंशियल सेक्टर अब क्लाइमेट रेजिलिएंस को सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि रिस्क मैनेजमेंट का जरूरी हिस्सा मान रहा है। यदि नियामक संस्थाएं (Regulatory bodies) इस आपदा के बाद पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण के कड़े मानक तय करती हैं, तो कंपनियों को अधिक अनुपालन लागत (Compliance costs) का सामना करना पड़ सकता है। इससे उन कंपनियों को नुकसान होगा जो पुराने ढर्रे पर काम कर रही हैं, जबकि बेहतर तकनीक अपनाने वाली कंपनियां बढ़त बना सकती हैं।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
आने वाले समय में निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां अपने ऑर्डर बुक में क्लाइमेट-रेजिलिएंट इंजीनियरिंग को कैसे शामिल कर रही हैं। कंपनियों की ओर से जियोलॉजिकल असेसमेंट, एडवांस मैटेरियल का इस्तेमाल और डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान की मजबूती अब उनके भविष्य के प्रॉफिट को तय करेगी। साथ ही, हिमालयी क्षेत्रों में नए सरकारी पर्यावरण ऑडिट और पॉलिसी अपडेट्स पर नजर रखना अब बेहद जरूरी हो गया है।
