पिछले दस सालों में नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ (NBWL) ने संरक्षित वन भूमि पर बने लगभग सभी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दे दी है। NBWL ने **96.5%** से ज़्यादा प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी दी है। हालांकि, इस हाई क्लीयरेंस रेट पर अब कानूनी सवाल उठ रहे हैं, जिससे बड़े इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स के लिए स्वतंत्र पर्यावरण निगरानी पर चिंता जताई जा रही है।
नियमों का खेल: NBWL का दबदबा
भारत में संरक्षण का जिम्मा संभालने वाली मुख्य संस्था, नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ (NBWL) का एक ऐसा पैटर्न सामने आया है जो चौंकाने वाला है। पिछले एक दशक में, NBWL ने संरक्षित वन क्षेत्रों में विकास के लिए आए लगभग 96.5% प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है। NBWL की स्टैंडिंग कमेटी के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 10 सालों में सबमिट किए गए सभी इंडस्ट्रियल और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में से 96.5% को अप्रूवल मिला है। इस हाई अप्रूवल रेट की वजह से पर्यावरण विशेषज्ञों और कानूनी समूहों के बीच यह चिंता बढ़ रही है कि क्या यह प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से काम कर रही है।
मंजूरी का पैटर्न: क्या सब कुछ ठीक है?
स्टैंडिंग कमेटी की मीटिंग्स के रिकॉर्ड्स बताते हैं कि 2016 से लेकर 2026 के मध्य तक, कमेटी ने 2,448 डेवलपमेंट प्रपोजल्स की समीक्षा की। इनमें से 1,876 प्रोजेक्ट्स को अप्रूव कर दिया गया, जबकि सिर्फ 66 को रिजेक्ट किया गया। साल 2018, 2021 और 2026 के पहले हाफ में तो कमेटी ने हर एक प्रोजेक्ट को पास कर दिया। इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट इकोनॉमिक ग्रोथ के लिए ज़रूरी है, लेकिन ये आंकड़े दर्शाते हैं कि प्रोजेक्ट्स को तेजी से मंजूरी देने का चलन बढ़ा है, जिसका कुछ क्षेत्रों की लॉन्ग-टर्म एनवायर्नमेंटल वायबिलिटी पर असर पड़ सकता है।
कानूनी चुनौतियां और जांच का दायरा
NBWL की कार्यप्रणाली की इंटीग्रिटी (Integrity) पर अब कानूनी सवाल उठ रहे हैं। दिल्ली हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई हैं। आलोचकों का कहना है कि प्रोजेक्ट्स का कठोर और स्वतंत्र मूल्यांकन नहीं हो रहा है। कमेटी की मीटिंग्स में किसी भी तरह के मतभेद या वोटिंग दर्ज नहीं की गई है। स्टैंडिंग कमेटी की कंपोजिशन (Composition) भी एक बड़ा मुद्दा है, जिसकी अध्यक्षता यूनियन एनवायरनमेंट मिनिस्टर करते हैं और इसमें कई सरकारी अधिकारी शामिल होते हैं। जानकारों का मानना है कि इस स्ट्रक्चर (Structure) की वजह से, खासकर बड़े सरकारी इंफ्रा इनिशिएटिव्स (Initiatives) के लिए, स्वतंत्र जांच की गुंजाइश कम हो जाती है।
भविष्य के प्रोजेक्ट्स पर असर
इन्वेस्टर्स (Investors) के लिए, यह ट्रेंड माइनिंग, रोड कंस्ट्रक्शन, रेलवे और एनर्जी ट्रांसमिशन जैसे सेक्टर्स में प्रोजेक्ट टाइमलाइन (Timelines) और रिस्क मैनेजमेंट (Risk Management) को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, हाई अप्रूवल रेट से डेवलपमेंट तेज होता है, लेकिन अगर क्लीयरेंस को जुडिशियल इंटरवेंशन (Judicial Intervention) से चुनौती मिलती है तो प्रोजेक्ट में देरी का खतरा बढ़ जाता है। निकोबार आइलैंड्स में ₹92,000 करोड़ का डेवलपमेंट प्रोजेक्ट इसका एक अहम उदाहरण है, जिसमें बड़े पैमाने पर जंगल की कटाई शामिल है और इसके बड़े इकोलॉजिकल इंपैक्ट (Ecological Impact) के कारण यह चर्चा में है।
इन्वेस्टर्स को इन हाई-वैल्यू प्रोजेक्ट्स की प्रगति पर नज़र रखनी चाहिए और एनवायर्नमेंटल क्लीयरेंस (Environmental Clearances) को लेकर संभावित पॉलिसी बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। इंडस्ट्री के लिए मुख्य बात यह होगी कि कंपनियां संभावित मुकदमेबाजी जोखिमों (Litigation Risks) और एनवायर्नमेंटल मिटिगेशन (Environmental Mitigation) की आवश्यकताओं को कैसे मैनेज करती हैं, क्योंकि अगर वर्तमान अप्रूवल प्रोसेस पर पब्लिक और लीगल दबाव बना रहा तो भविष्य में जुडिशियल या रेगुलेटरी ओवरसाइट (Regulatory Oversight) और सख्त हो सकती है।
