Marine Cloud Brightening: क्या एल नीनो के सुपर इफेक्ट को कम करेगा ये नया तरीका?

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AuthorNeha Patil|Published at:
Marine Cloud Brightening: क्या एल नीनो के सुपर इफेक्ट को कम करेगा ये नया तरीका?

एक नई रिसर्च में पता चला है कि समंदर में समुद्री नमक के कणों का छिड़काव करके बादलों को चमकाया जा सकता है, जिससे सुपर एल नीनो (Super El Niño) के असर को कम किया जा सकता है। यह तकनीक सूरज की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में भेजकर लोकल कूलिंग का असर पैदा करती है, जो एल नीनो के कारण होने वाले भयानक मौसम से होने वाले नुकसान को कम कर सकती है।

कैसे काम करती है ये नई तकनीक?

इस हफ्ते पब्लिश हुई एक रिसर्च के मुताबिक, समुद्री बादलों को चमकाने (Marine Cloud Brightening) की तकनीक सुपर एल नीनो के असर को कंट्रोल करने में मददगार हो सकती है। रिसर्च में बताया गया है कि समंदर के निचले वायुमंडल में नमक जैसे छोटे कणों को छोड़ने से बादलों में छोटी-छोटी बूंदों की संख्या बढ़ जाती है। इससे बादलों की ऊपरी सतह ज्यादा चमकदार हो जाती है, जो सूरज की ज्यादा रोशनी को वापस अंतरिक्ष में भेज देती है। इस तरह, धरती की सतह और नीचे के समंदर का तापमान कम होता है।

ग्लोबल वेदर पर असर

जेसिका एस. वैन (Jessica S. Wan) के नेतृत्व में हुई इस रिसर्च में क्लाइमेट मॉडल का इस्तेमाल किया गया है। इससे यह समझने की कोशिश की गई कि यह लोकल कूलिंग ग्लोबल क्लाइमेट पर क्या असर डाल सकती है। रिसर्च बताती है कि एल नीनो के शुरुआती फेज में समंदर के कुछ खास हिस्सों को ठंडा करके, इस तकनीक से समंदर और हवा के बीच का वो फीडबैक लूप तोड़ा जा सकता है, जो एल नीनो को 'सुपर' एल नीनो बनने में मदद करता है। 1997-1998 और 2015-2016 के पुराने डेटा पर की गई सिमुलेशन से पता चलता है कि ऐसी दखलअंदाजी से इन दौरों में बढ़ने वाले टेम्परेचर और बारिश को कम किया जा सकता है।

वैज्ञानिक पहलू और खतरे

हालांकि, रिसर्च में यह भी साफ किया गया है कि यह तरीका नेचुरल क्लाइमेट वेरिएशंस को मैनेज करने का एक थ्योरिटिकल टूल है और इसके अपने खतरे भी हैं। रिसर्च में इस बात पर जोर दिया गया है कि एल नीनो को कमजोर करने से शायद ला नीना (La Niña) जल्दी आ जाए, जिससे दूसरी जगहों पर मौसम में अनपेक्षित बदलाव हो सकते हैं। साथ ही, यह कूलिंग का असर तब तक ही रहता है जब तक कणों का छिड़काव जारी रहता है।

इन संभावित साइड इफेक्ट्स को देखते हुए, रिसर्चर्स इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जियोइंजीनियरिंग (Geoengineering) तकनीकों का ग्लोबल सिस्टम्स पर क्या असर पड़ता है, इस पर और रिसर्च की जानी चाहिए। अभी बड़े पैमाने पर फील्ड टेस्ट की कोई योजना नहीं है। भविष्य में इसे लागू करने के लिए गहरी स्टडी और सरकारी स्तर पर फैसले लेने की जरूरत होगी, ताकि टेक्निकल फीजिबिलिटी और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर, दोनों को समझा जा सके। उन निवेशकों और स्टेकहोल्डर्स के लिए जो क्लाइमेट वोलेटिलिटी से प्रभावित होने वाले सेक्टर (जैसे खेती, बीमा और एनर्जी) में हैं, उनके लिए इन क्लाइमेट-मॉडलिंग टेक्नोलॉजी के विकास पर नजर रखना और जियोइंजीनियरिंग नीतियों पर होने वाली किसी भी चर्चा पर ध्यान देना अहम होगा।

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