Western Ghats: केरल विधानसभा का बड़ा कदम, 98 गांवों को इको-सेंसिटिव जोन से बाहर करने की मांग

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Western Ghats: केरल विधानसभा का बड़ा कदम, 98 गांवों को इको-सेंसिटिव जोन से बाहर करने की मांग

केरल विधानसभा ने एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पास कर केंद्र सरकार से **98** गांवों को पश्चिमी घाट (Western Ghats) के इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया से बाहर रखने की मांग की है। यह क्षेत्र करीब **8,590.69** वर्ग किलोमीटर में फैला है, जिसका सीधा असर वहां चल रहे प्रोजेक्ट्स और उद्योगों पर पड़ सकता है।

केरल विधानसभा ने केंद्र सरकार से पश्चिमी घाट के इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया (ESA) नोटिफिकेशन को संशोधित करने का औपचारिक आग्रह किया है। गुरुवार को पास हुए इस प्रस्ताव का मकसद पारंपरिक खेती, रिहायशी इलाकों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, जिससे पिछले लंबे समय से चली आ रही रेगुलेटरी अनिश्चितता को कम किया जा सके।\n\n### इंडस्ट्री और एनर्जी सेक्टर पर प्रभाव\n\nइस प्रस्ताव का एक बड़ा हिस्सा 'रेड कैटेगरी' उद्योगों के लिए विशेष छूट से जुड़ा है। वर्तमान में ये इकाइयां संवेदनशील जोन में होने के कारण सख्त पर्यावरण नियमों का सामना कर रही हैं। राज्य सरकार डेयरी प्रोसेसिंग, मीट प्रोसेसिंग और ऐसे हेल्थकेयर संस्थानों के लिए राहत की वकालत कर रही है जिन्हें पावर बैकअप के लिए हाई-कैपेसिटी डीजल जनरेटर की जरूरत होती है।\n\nएनर्जी सेक्टर के लिए भी यह प्रस्ताव काफी अहम है, क्योंकि इसमें पम्प्ड-स्टोरेज हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स के लिए विशेष रियायत की मांग की गई है। इसके अलावा, Cardamom Hill Reserve को भी विशिष्ट छूट के दायरे में रखने का सुझाव दिया गया है, क्योंकि वहां दशकों से पारंपरिक इलायची की खेती हो रही है।\n\n### निवेशकों के लिए संकेत\n\nराज्य सरकार का यह कदम आर्थिक गतिविधियों को रफ्तार देने के लिए है, लेकिन अंतिम फैसला केंद्र सरकार को ही लेना है। यह मामला कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट के बाद से ही विवादों और चर्चाओं में रहा है। निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि केंद्र सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाती है। यदि केंद्र सरकार छूट देने का फैसला लेती है, तो कई रुके हुए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को रेगुलेटरी क्लीयरेंस मिलने का रास्ता साफ हो सकता है। हालांकि, यदि नियमों में बदलाव नहीं होता है, तो इन 98 गांवों में काम कर रही कंपनियों को भविष्य में भी स्टैच्यूटरी और पर्यावरण संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

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