सर्कुलर इकोनॉमी (Circular Economy) स्टार्टअप Karo Sambhav ने Zerodha के Rainmatter से ₹56 करोड़ की बड़ी फंडिंग जुटाई है। इस पैसे से कंपनी ई-कचरे (e-waste) से लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे महत्वपूर्ण खनिज निकालने के लिए अपना इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाएगी। यह कदम भारत के बढ़ते बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए बेहद अहम है।
क्या हुआ
गुरुग्राम की रीसाइक्लिंग स्टार्टअप Karo Sambhav ने प्री-सीरीज ए (Pre-Series A) फंडिंग राउंड में ₹56 करोड़ जुटाए हैं। इस निवेश का नेतृत्व Zerodha के इन्वेस्टमेंट आर्म Rainmatter ने किया। Karo Sambhav सर्कुलर इकोनॉमी सॉल्यूशंस पर फोकस करती है, जिसका मतलब है कि चीजों को फेंकने के बजाय लंबे समय तक इस्तेमाल में रखना। कंपनी इस कैपिटल का इस्तेमाल एडवांस रीसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए करेगी, जो खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक कचरे (electronic waste) से कीमती मैटेरियल्स निकालने के लिए डिजाइन किया गया है।
Critical Minerals क्यों ज़रूरी हैं?
भारत दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है, जो सालाना 40 लाख मीट्रिक टन से ज़्यादा होता है। पहले, इस कचरे को असंगठित क्षेत्र (unorganized sector) द्वारा प्रोसेस किया जाता था, जहाँ मैटेरियल रिकवरी या तो बहुत कम होती थी या पर्यावरण के लिए खतरनाक थी। लेकिन, आजकल के इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) बैटरियों में लिथियम, कोबाल्ट, निकल और कॉपर जैसे खास 'क्रिटिकल मिनरल्स' की ज़रूरत पड़ती है।
जैसे-जैसे भारत बैटरी मैन्युफैक्चरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स का एक बड़ा हब बनने की कोशिश कर रहा है, इन मैटेरियल्स को सुरक्षित करना एक राष्ट्रीय प्राथमिकता है। ई-कचरे से इन मिनरल्स को घरेलू स्तर पर रिकवर करके - जिसे 'अर्बन माइनिंग' (urban mining) भी कहते हैं - Karo Sambhav जैसी कंपनियां भारत की आयात पर निर्भरता को कम करना चाहती हैं। यह कदम 'नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन' (National Critical Minerals Mission) के अनुरूप है, और कंपनी ने इस तरह की रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने के लिए सरकारी इंसेंटिव्स (incentives) के लिए पात्रता (eligibility) भी हासिल कर ली है।
नौ साल के ट्रैक रिकॉर्ड पर निर्माण
कई स्टार्टअप्स के विपरीत जो वेंचर फंडिंग से जल्दी स्केल करते हैं, Karo Sambhav ने नौ सालों तक बूटस्ट्रैप्ड (bootstrapped) बिजनेस के तौर पर काम किया है। इसका मतलब है कि कंपनी ने बाहरी निवेश मांगने से पहले अपने रेवेन्यू और प्रॉफिट से ग्रोथ की। फिलहाल, यह भारत के 50 शहरों में कलेक्शन नेटवर्क मैनेज करती है और 1.5 लाख मीट्रिक टन से ज़्यादा कचरा प्रोसेस कर चुकी है। निवेशक अक्सर ऐसे ट्रैक रिकॉर्ड पर नज़र रखते हैं, क्योंकि यह दिखाता है कि कंपनी के पास जटिल मैटेरियल रिकवरी में विस्तार करने से पहले कचरे को कलेक्ट और प्रोसेस करने का एक वर्किंग मॉडल है।
ऑपरेशनल चुनौती
हालांकि क्रिटिकल मिनरल्स को रिकवर करने का लक्ष्य बहुत रणनीतिक है, भारत में रीसाइक्लिंग सेक्टर को कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सबसे बड़ी बाधाओं में से एक अनौपचारिक बाज़ार है, जो देश के अधिकांश ई-कचरे को इकट्ठा करता है। Karo Sambhav जैसे फॉर्मल रीसाइक्लर्स को सप्लाई के लिए इन अनौपचारिक नेटवर्क से मुकाबला करना पड़ता है। इसके अलावा, जटिल डिवाइसेज से हाई-प्योरिटी मिनरल्स निकालने के लिए एडवांस्ड टेक्नोलॉजी और मशीनरी पर बड़े कैपिटल खर्च की ज़रूरत होती है। हमेशा यह जोखिम रहता है कि अगर एडवांस्ड रीसाइक्लिंग टेक्नोलॉजी की लागत बहुत ज़्यादा हो जाती है या ई-कचरे की सप्लाई लगातार नहीं मिलती है, तो ऐसे प्रोजेक्ट्स की प्रॉफिटेबिलिटी पर दबाव आ सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए
ग्रीन एनर्जी और रीसाइक्लिंग सेक्टर को फॉलो करने वाले निवेशकों के लिए, यह डेवलपमेंट सर्कुलर इकोनॉमी के बढ़ते महत्व को दर्शाता है। अगले महत्वपूर्ण अपडेट्स इस नए रीसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के चालू होने की टाइमलाइन और कंपनी कितने ई-कचरे को प्रोसेस करने की मात्रा सफलतापूर्वक बढ़ा पाती है, इस पर होंगे। निवेशक यह भी देख सकते हैं कि कंपनी बूटस्ट्रैप्ड एंटिटी से बाहरी कैपिटल का इस्तेमाल करके तेजी से विस्तार करने वाली कंपनी बनने की राह पर अपने ऑपरेशनल डिसिप्लिन को कैसे बनाए रखती है। आखिरकार, 'नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन' के तहत सरकारी पॉलिसी अपडेट्स पर नज़र रखना महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि भविष्य के रेगुलेटरी सपोर्ट या इंसेंटिव्स क्रिटिकल मिनरल रीसाइक्लिंग बिजनेस के इकोनॉमिक्स को काफी हद तक बदल सकते हैं।
