भारत का ग्रीन कवर 2001 से 2025 के बीच **5.6%** घटकर **31.35%** रह गया है, जिससे स्थानीय तापमान में **2.5°C** तक की बढ़ोतरी हुई है। यह बदलाव रियल एस्टेट, पावर और इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए बड़े फाइनेंशियल रिस्क के संकेत दे रहा है।
भारत के बदलते लैंडस्केप ने इकोनॉमिक फ्रंट पर नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। Climate Trends की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में ग्रीन कवर का 36.95% से गिरकर 31.35% पर आना गर्मियों में तापमान को 2.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा रहा है। निवेशकों के लिए यह रिस्क इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे कंपनियों की ऑपरेशनल कॉस्ट और रेगुलेटरी कंप्लायंस पर सीधा असर पड़ेगा।\n\n### पावर और इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव\nतेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण नेचुरल कूलिंग कम हो रही है, जिससे पावर और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर पर भारी दबाव है। अब देश का 68.65% हिस्सा 'नॉन-ग्रीन' हो चुका है। इसका मतलब है कि कूलिंग की जरूरत बढ़ेगी, जिससे मैन्युफैक्चरिंग और ऑफिस ऑपरेशन्स की एनर्जी डिमांड बढ़ेगी और कंपनियों का मुनाफा प्रभावित हो सकता है।\n\n### रियल एस्टेट की बदलती प्लानिंग\nअब रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए 'क्लाइमेट-रेजिलिएंट' प्रोजेक्ट्स एक जरूरी पैरामीटर बन गए हैं। जो प्रोजेक्ट्स ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर से लैस नहीं हैं, उन्हें 'थर्मल रिस्क' का सामना करना पड़ेगा, जिससे मेंटेनेंस कॉस्ट बढ़ सकती है और एसेट की उम्र भी कम हो सकती है।\n\n### ESG और सरकारी रेगुलेशन\nआने वाले समय में ESG (Environmental, Social, and Governance) के नियम और सख्त होंगे। हीटवेव एक नेशनल पॉलिसी कंसर्न बन चुका है, इसलिए भविष्य में लैंड-यूज प्लानिंग के नियम कड़े किए जा सकते हैं। जो कंपनियां अपने एनवायरनमेंट फुटप्रिंट को मैनेज नहीं कर पाएंगी, उन्हें भविष्य में भारी कंप्लायंस कॉस्ट का सामना करना पड़ सकता है। निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी होगी कि कंपनियां अपनी एनुअल रिपोर्ट में क्लाइमेट रिस्क को कैसे डिस्क्लोज करती हैं।
