पर्यावरण का बदलता मिजाज, अर्थव्यवस्था पर भारी:
प्रोफेसर जगदीश कृष्णस्वामी ने अनिल अग्रवाल डायलॉग में अपने शोध के ज़रिए भारत के आर्थिक भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी दी है। उन्होंने बताया कि देश में पर्यावरण में हो रहे ये बड़े बदलाव, जिनमें आक्रामक प्रजातियों का बढ़ना और पानी का गंभीर असंतुलन शामिल है, सिर्फ़ पर्यावरण तक सीमित नहीं हैं। ये बदलाव निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और देश की कृषि व्यवस्था के लिए सीधे तौर पर बड़े जोखिम खड़े कर रहे हैं। इन हालातों को देखते हुए कैपिटल एलोकेशन (Capital Allocation) और विकास नीतियों के तरीके में बड़ा बदलाव लाना ज़रूरी है।
आक्रामक प्रजातियों का आर्थिक बोझ:
पूरे भारत में वनस्पति के हरे-भरे दिखने के पीछे एक चिंताजनक सच्चाई छिपी है - वह है आक्रामक एलियन प्रजातियों (invasive alien species) का तेज़ी से बढ़ना। ये प्रजातियाँ सिर्फ़ ज़मीन के नज़ारे को ही नहीं बदल रही हैं, बल्कि मिट्टी की संरचना और हाइड्रोलॉजिकल साइकिल (hydrological cycles) को भी पूरी तरह से बदल रही हैं, खासकर पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील इलाकों में। इसका आर्थिक असर बहुत बड़ा है। जहाँ दुनिया भर में आक्रामक प्रजातियों की वजह से खरबों डॉलर का नुकसान हो रहा है, वहीं भारत को 1960-2020 के बीच अनुमानित $127.3 बिलियन का नुकसान हुआ है। इन प्रजातियों का बढ़ना हैबिटेट फ्रेगमेंटेशन (habitat fragmentation), ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव और क्लाइमेट चेंज (climate change) के कारण और तेज़ हो गया है। ये सीधे तौर पर कृषि उपज, मछली पालन और यहां तक कि महत्वपूर्ण इकोसिस्टम को भी खतरे में डाल रही हैं। भारत के दो-तिहाई प्राकृतिक इकोसिस्टम पर अब इन्हीं पौधों का कब्ज़ा हो गया है, जिससे लाखों लोग सामाजिक-पारिस्थितिक जोखिमों का सामना कर रहे हैं और प्रकृति पर निर्भर लोगों की आजीविका खतरे में है। यह पर्यावरणीय असंतुलन सीधे तौर पर उन सेक्टर्स के लिए वित्तीय जोखिम बन गया है जो स्थिर इकोसिस्टम और अनुमानित कृषि उत्पादन पर निर्भर हैं।
जल असंतुलन - एक मैक्रोइकॉनॉमिक खतरा:
भारत का जल संकट अब सिर्फ़ पानी की कमी का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गहरे असंतुलन का रूप ले चुका है, जहाँ एक ही समय में भयंकर बारिश, बाढ़ और भीषण सूखे जैसी स्थितियाँ देखी जा रही हैं। राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर का असर, जिससे कुछ इलाकों में नमी बढ़ी है, वहीं अन्य क्षेत्रों में सूखे की मार झेलनी पड़ रही है। इसके आर्थिक परिणाम बहुत व्यापक हैं: कृषि, जो भारत के जीडीपी (GDP) का 15% है और 40% आबादी को रोज़गार देती है, इस अनियमित मौसम के प्रति बहुत संवेदनशील है। इससे फ़सलें बर्बाद हो सकती हैं, आय कम हो सकती है और खाद्य असुरक्षा बढ़ सकती है। अनुमान है कि 2030 तक क्लाइमेट चेंज के कारण कृषि उत्पादन में 16% तक की कमी आ सकती है, जो जीडीपी (GDP) में 2.8% के नुकसान के बराबर है। इसके अलावा, पानी की कमी एक सिस्टेमिक रिस्क (systemic risk) के रूप में उभर रही है, जहाँ दुनिया की लगभग 60% जीडीपी (GDP) पानी की उपलब्धता के मुद्दों से प्रभावित हो सकती है। भारत में पानी की मांग 2030 तक उपलब्ध आपूर्ति से दोगुनी हो सकती है, जो आर्थिक विकास को बाधित कर सकती है और सॉवरेन (sovereign) व कॉर्पोरेट (corporate) स्टेबिलिटी (stability) को प्रभावित कर सकती है। पानी के इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) में अनुमानित $60–75 बिलियन का निवेश महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे सिर्फ़ कमी के बजाय इस सिस्टमैटिक असंतुलन को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
जोखिमों का पूरा विश्लेषण:
ये आपस में जुड़े हुए पारिस्थितिक (ecological) मुद्दे भारत की आर्थिक प्रगति और निवेश के माहौल के लिए गंभीर जोखिम पैदा करते हैं। पुरानी, सिर्फ़ आपूर्ति-केंद्रित इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) मॉडल, जैसे बड़े बांध और नहरें, अस्थिर जल पैटर्न और चरम मौसम की घटनाओं से निपटने के लिए अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। शासन (governance) की विफलताएं और कड़े नियमों की कमी, खासकर ग्राउंडवाटर एक्सट्रैक्शन (groundwater extraction) के संबंध में, महत्वपूर्ण संसाधनों के क्षरण को और बढ़ा रही हैं। उदाहरण के लिए, खेती के लिए मुफ्त या भारी सब्सिडी वाली बिजली धान जैसी पानी-गहन फसलों के लिए पानी के अत्यधिक दोहन को प्रोत्साहित करती है, जिससे भूजल (groundwater) का भारी क्षरण होता है और राज्य बिजली बोर्डों को बड़ा वित्तीय नुकसान होता है। उन निवेशों के 'स्ट्रैंडेड एसेट्स' (stranded assets) बनने की उच्च संभावना है जो पानी-गहन परियोजनाओं में किए गए हैं और जो बढ़ते जल तनाव वाले क्षेत्रों में टिकाऊ साबित नहीं हो पाते। इसके अलावा, प्रदूषण और आक्रामक प्रजातियों सहित पर्यावरणीय क्षरण की आर्थिक लागतें बहुत ज़्यादा हैं। सिर्फ़ आक्रामक प्रजातियों से 1960-2020 के बीच $127.3 बिलियन का अनुमानित नुकसान हुआ, और वायु प्रदूषण के कारण सालाना जीडीपी (GDP) का लगभग 3% नुकसान हो रहा है। पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में अनियंत्रित विकास सिर्फ़ बायोडायवर्सिटी (biodiversity) को ही नहीं, बल्कि पर्यटन और कृषि पर निर्भर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं को भी खतरे में डालता है। आवास विनाश से मानव-वन्यजीव संघर्ष और आदिवासी आबादी का विस्थापन बढ़ सकता है। कानूनी और नीतिगत ढाँचे अक्सर तेज़ी से बदलते पर्यावरणीय व्यवधानों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते, जिससे एक नियामक अंतर (regulatory gap) पैदा होता है जो ज़्यादा शोषण और धीमी अनुकूलन क्षमता की अनुमति देता है। उदाहरण के लिए, गंभीर जल संकट के बावजूद, तमिलनाडु जैसे राज्यों में भूजल उपयोग के लिए नियामक ढाँचे या तो रद्द कर दिए गए हैं या ठीक से लागू नहीं किए गए हैं। पूर्व सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश दीपक गुप्ता के अनुसार, अदालतों द्वारा पर्यावरणीय क्षति के बजाय प्रक्रिया पर ज़्यादा ज़ोर देना, अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक क्षति के जोखिम को और बढ़ाता है।
भविष्य की राह:
इन जटिल पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए टिकाऊ, जलवायु-लचीली रणनीतियों (climate-resilient strategies) की ओर एक मौलिक बदलाव की आवश्यकता है। 2030 तक भारत की क्लाइमेट एक्शन (climate action) के लिए अनुमानित US$1.5 ट्रिलियन निवेश की ज़रूरत है, जिसमें रिन्यूएबल एनर्जी (renewable energy), वाटर सिक्योरिटी (water security) और सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (sustainable agriculture) शामिल हैं। प्राइवेट सेक्टर (private sector) का निवेश महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके लिए नवीन फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स (financial instruments) और म्युनिसिपैलिटीज (municipalities) की साख सुधारने तथा निवेश जोखिमों को कम करने के लिए सिस्टेमिक बदलावों की आवश्यकता है। 'ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर' (blue-green infrastructure), पार्टिसिपेटरी ग्राउंडवाटर मैनेजमेंट (participatory groundwater management) और वाटर-एफिशिएंट एग्रीकल्चरल प्रैक्टिसेज (water-efficient agricultural practices) को एकीकृत करना आवश्यक नीतिगत दिशाएं हैं। 'ब्लू वाटर' (surface and groundwater) के साथ-साथ 'ग्रीन वाटर' (rainwater stored in soil for vegetation) को महत्व देना, प्रभावी क्लाइमेट वेरिएबिलिटी मैनेजमेंट (climate variability management) के लिए महत्वपूर्ण है। भारत के परिवर्तन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह आर्थिक विकास को पारिस्थितिक संरक्षण के साथ कैसे जोड़ता है, और ऐसे निवेशों को कैसे बढ़ावा देता है जो इन बढ़ते पर्यावरणीय और सिस्टेमिक जोखिमों को ध्यान में रखते हैं, जिससे दीर्घकालिक समृद्धि और स्थिरता सुनिश्चित हो सके।
