NGT की सरकारों से कड़ी मांग
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने केंद्र सरकार और अन्य संबंधित अथॉरिटीज से देश के बिगड़ते वायु प्रदूषण संकट पर जवाब मांगा है। एक कोर्ट फाइलिंग में साफ कहा गया है कि यह स्थिति अब एक राष्ट्रीय 'सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल' बन चुकी है। NGT ने इस मामले में दायर दोनों याचिकाओं पर 14 मई को एक साथ सुनवाई करने का फैसला किया है।
सांस लेना भी बना जानलेवा जोखिम
देश एक भयानक और लगातार बने रहने वाले प्रदूषित हवा के जाल में फंस गया है। हानिकारक प्रदूषक लगातार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य मानकों को पार कर रहे हैं। यह खतरनाक स्थिति, जो कई सालों से बनी हुई है, और भी बदतर होती जा रही है और हर साल लाखों लोगों की असमय मौत का कारण बन रही है। याचिका में साफ तौर पर कहा गया है, "हवा की गुणवत्ता इतनी खराब हो गई है कि सांस लेना खुद एक स्वास्थ्य जोखिम बन गया है।"
मौतों का चौंकाने वाला आंकड़ा और आर्थिक बोझ
वैज्ञानिक अध्ययन इस समस्या की गंभीरता को साफ बयां करते हैं। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी के अनुसार, 2019 में भारत में वायु प्रदूषण के कारण 16.7 लाख लोगों की मौत हुई, जो कुल मौतों का 17.8% था। इसमें 9.8 लाख मौतें बाहरी प्रदूषण से और 6.1 लाख मौतें घर के अंदर (घरेलू) प्रदूषण से हुईं। इसका आर्थिक प्रभाव भी बहुत गंभीर है, जहां असमय मौतें और बीमारियों के कारण अनुमानित 36.8 अरब डॉलर (भारत की जीडीपी का 1.36%) का नुकसान हुआ। वायु प्रदूषण से हर दिन 464 बच्चों की पांच साल से कम उम्र में मौत हो जाती है।
शहर लगातार हवा की गुणवत्ता मानकों पर फेल
2015 से 2025 तक के डेटा से पता चलता है कि इस पूरे दौर में भारत का कोई भी प्रमुख शहर सुरक्षित हवा की गुणवत्ता के मानकों को पूरा नहीं कर पाया। दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) का स्तर लगातार बहुत ऊंचा दर्ज किया गया। लखनऊ और वाराणसी जैसे शहरों में भी अक्सर निर्धारित सीमा पार हुई। कोलकाता, मुंबई और चेन्नई जैसे अपेक्षाकृत साफ शहरों में भी AQI का स्तर अनुशंसित सीमा से काफी ऊपर रहा।
शासन व्यवस्था पर सवाल: खंडित और प्रतिक्रियावादी
याचिका में भारत के वायु प्रदूषण से निपटने के तरीके की आलोचना की गई है, इसे बिखरा हुआ, प्रतिक्रियावादी और मौसमी बताया गया है। जवाब अक्सर चरम प्रदूषण के समय में अस्थायी समाधान पर केंद्रित होते हैं, बजाय इसके कि उत्सर्जन के दीर्घकालिक स्रोतों पर ध्यान दिया जाए। याचिका में तर्क दिया गया है कि एयर (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन) एक्ट, 1981 जैसे कानून होने के बावजूद, प्रवर्तन (enforcement) असंगठित निकायों में फैला हुआ है। अथॉरिटीज के पास व्यापक डेटा और निगरानी की कमी है। एक अवलोकन में कहा गया है: "जो गिना नहीं जाता, उसका शासन नहीं होता; जो दर्ज नहीं होता, उसे रोका नहीं जा सकता।"
राष्ट्रीय ढांचे और समन्वित कार्रवाई की मांग
याचिकाकर्ता NGT से बड़े सुधारों को अनिवार्य करने का आग्रह कर रहा है। प्रमुख मांगों में एक एकीकृत राष्ट्रीय योजना बनाना, वायु प्रदूषण को एक सार्वजनिक नुकसान के रूप में स्वीकार करना, पर्यावरणीय निगरानी को सार्वजनिक स्वास्थ्य ट्रैकिंग से जोड़ना और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि सरकारी एजेंसियां एक साथ मिलकर काम करें। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह संकट कमजोर कानूनों के कारण नहीं, बल्कि खराब निष्पादन (execution), समन्वय (coordination) और जवाबदेही (accountability) के कारण उत्पन्न हुआ है, और इसका उद्देश्य स्वच्छ हवा के संवैधानिक अधिकार को सुरक्षित करना है।