केंद्रीय बिजली मंत्री मनोहर लाल के अनुसार, यह कदम उत्सर्जन को कम करने और जलवायु कार्रवाई के लिए एक मजबूत आर्थिक तंत्र बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस कार्बन मार्केट को केवल एक अनुपालन (Compliance) के साधन के तौर पर नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय संपत्ति (National Asset) के रूप में तैयार किया जा रहा है, जो अर्थव्यवस्था को भी गति देगा। यह भारत के 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन (Net-Zero Emissions) के लक्ष्य के अनुरूप है। वर्ष 2026 तक, 490 बड़ी कंपनियों को अपने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की तीव्रता (Emissions Intensity) को कम करने के लक्ष्य दिए जाएंगे। इन कंपनियों को अपने कार्बन फुटप्रिंट को घटाना होगा। जो कंपनियाँ निर्धारित लक्ष्य से अधिक उत्सर्जन कम करेंगी, वे अपने अतिरिक्त कार्बन क्रेडिट (Carbon Credits) उन कंपनियों को बेच सकेंगी जिन्हें इनकी जरूरत है। इससे कार्बन न्यूट्रल बनने के लिए एक प्रोत्साहन-आधारित (Incentive-based) दृष्टिकोण मिलेगा।
बाजार एक रेट-आधारित (Rate-based) प्रणाली पर काम करेगा, जो उत्पादन की प्रति यूनिट उत्सर्जन को बेंचमार्क से जोड़ेगा। यह यूरोपीय संघ के EU ETS से अलग है, जहाँ तय सीमाएँ होती हैं। इस तरीके से प्रति यूनिट उत्पादन के हिसाब से होने वाले उत्सर्जन पर जुर्माना लगाया जाएगा, लेकिन इससे आर्थिक विकास या औद्योगिक अपग्रेड में बाधा नहीं आएगी। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, कार्बन क्रेडिट की कीमत लगभग $10 प्रति मीट्रिक टन CO2 के बराबर हो सकती है। यह प्रणाली 'परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड' (Perform, Achieve and Trade - PAT) कार्यक्रम पर आधारित है, जिसने ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा दिया है और सालाना लगभग 87 मिलियन टन CO2 उत्सर्जन कम किया है।
विश्लेषकों का अनुमान है कि 2030 तक यह बाजार $10 बिलियन से अधिक का हो सकता है, जो विशेष रूप से ग्रीन हाइड्रोजन और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल जैसे क्षेत्रों में भारी मात्रा में क्लाइमेट फाइनेंस (Climate Finance) और टेक्नोलॉजी निवेश को आकर्षित करेगा। यह भारत के लिए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (Foreign Direct Investment - FDI) को आकर्षित करने का एक रणनीतिक अवसर प्रदान करता है, क्योंकि स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं में पहले से ही 2020 से 2025 के मध्य तक लगभग $19 बिलियन का निवेश आ चुका है।
यह नया बाजार शुरू में 9 उच्च-उत्सर्जन वाले क्षेत्रों को कवर करेगा, जिससे भारत संगठित औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन (Industrial Decarbonization) के मामले में कई अन्य उभरते देशों से आगे निकल जाएगा। यह भारतीय निर्यातकों, विशेष रूप से स्टील और सीमेंट जैसे क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि यह उन्हें वैश्विक उत्सर्जन मानकों को पूरा करने और यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे उपायों का मुकाबला करने में मदद करेगा।
हालांकि, इस महत्वाकांक्षी योजना के सामने महत्वपूर्ण चुनौतियाँ भी हैं। इनमें लक्ष्यों को निर्धारित करने में संभावित देरी, नौकरशाही की अड़चनें (Bureaucratic Red Tape) और दंड के नियमों में अस्पष्टता शामिल है। बाजार की सफलता मजबूत निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन (Monitoring, Reporting, and Verification - MRV) प्रणालियों और स्थिर नियमों पर निर्भर करेगी। उचित स्थिरता तंत्र (Stability Mechanisms) के अभाव में, बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव (Price Swings) और कार्बन की कीमतों में गिरावट का जोखिम हो सकता है, जो कम-कार्बन निवेशों को नुकसान पहुंचा सकता है। 'परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड' (PAT) योजना के तहत लक्ष्य से अधिक हासिल करने और बहुत अधिक ट्रेड करने योग्य प्रमाणपत्र (Tradable Certificates) बनने का पिछला अनुभव, लक्ष्यों के सटीक कैलिब्रेशन और क्रेडिट आपूर्ति की आवश्यकता को उजागर करता है।
चिंता की बात यह है कि 'क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर' (Climate Action Tracker) के अनुसार, भारत की वर्तमान नीतियां 1.5°C के लक्ष्य के लिए 'अत्यधिक अपर्याप्त' (Highly Insufficient) मानी गई हैं। हालांकि नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) में तेजी से वृद्धि हो रही है, भारत अभी भी कोयले पर बहुत अधिक निर्भर है, जो जीवाश्म ईंधन से दूर जाने की चुनौती को दर्शाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बाजार का लॉन्च 2026 के लिए भारत का एक प्रमुख विकास होगा, जो उभरते बाजारों में स्थिरता (Sustainability) की ओर बढ़ते वैश्विक रुझानों के अनुरूप है। वैश्विक निवेशक ऊर्जा दक्षता और नवीकरणीय ऊर्जा को प्राथमिकता देते हुए अपनी पूंजी को स्थिरता की ओर ले जा रहे हैं। 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के भारत के लक्ष्य इसे एक मजबूत स्थिति में रखते हैं। इस बाजार को ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) के लिए एक महत्वपूर्ण निवेश उपकरण बनने की उम्मीद है, लेकिन इसके डिजाइन को विश्वसनीय और स्थिर कार्बन मूल्य सुनिश्चित करने के लिए लचीलेपन और अनुशासन का संतुलन बनाना होगा। 2027 तक इसके चरणबद्ध विकास (Phased Approach) की योजना, बाजार को परिपक्व करने की रणनीति का संकेत देती है। भविष्य में अंतरराष्ट्रीय बाजारों के साथ इसके जुड़ने से व्यापार प्रतिस्पर्धा को प्रबंधित करने में मदद मिल सकती है, खासकर CBAM जैसे उपायों के मुकाबले।
