दुनिया में भारत का दबदबा: कार्बन मार्केट में लीडरशिप की ओर
भारत ग्लोबल कार्बन मार्केट में अपनी भूमिका को stratégic तरीके से बदल रहा है। अब यह सिर्फ इस मार्केट का हिस्सा बनने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके नियमों को सक्रिय रूप से आकार देगा। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए, देश कार्बन रजिस्ट्री ऑफ इंडिया (CRI) जैसे डोमेस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर और कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) जैसे रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को मजबूत कर रहा है। अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रक्रियाओं को विकसित करके, भारत दक्षिण एशिया और मध्यम-आय वाले देशों के बीच वॉलंटरी कार्बन मार्केट (Voluntary Carbon Market) में नेतृत्व करने की महत्वाकांक्षा रखता है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्लोबल वॉलंटरी कार्बन मार्केट तेजी से बढ़ रहा है, जिसमें 'अवॉइडेंस' क्रेडिट से ज्यादा मूल्यवान 'रिमूवल' क्रेडिट की ओर रुझान बढ़ रहा है।
चुनौती: कम क्रेडिट प्राइस और भरोसे का सवाल
भारत के कार्बन मार्केट के लिए पारदर्शिता के ज़रिए विश्वास बनाना बेहद अहम है। CRI जैसी संस्थाएं और Terrablu जैसी कंपनियां प्रोजेक्ट्स को औपचारिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। हालांकि, भारत को एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है - क्रेडिट की कीमतों में भारी अंतर। 2024 की शुरुआत में, भारतीय कार्बन क्रेडिट की औसत कीमत $2.35 प्रति टन CO2 थी, जो पड़ोसी देशों जैसे श्रीलंका ($3.77) और पाकिस्तान ($28.11) की तुलना में काफी कम है। यह कम कीमत, क्रेडिट की गुणवत्ता को लेकर वैश्विक सवाल और पिछले प्रोजेक्ट्स के मुद्दों के साथ मिलकर, मजबूत इंटेग्रिटी स्टैंडर्ड्स (Integrity Standards) की जरूरत को रेखांकित करती है। भारत के नए सरकारी-अनुमोदित तरीके ऑफसेट की गुणवत्ता सुधारने का लक्ष्य रखते हैं, लेकिन बड़े कॉर्पोरेट्स के लिए खरीदार का भरोसा जीतने हेतु Verra और Gold Standard जैसे अंतर्राष्ट्रीय मानक अभी भी महत्वपूर्ण हैं।
निवेशकों की चिंताएं: रेगुलेटरी रुकावटें और वैश्विक जोखिम
इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (Institutional Investors) भारत के कार्बन मार्केट में कई गंभीर बाधाएं देख रहे हैं। CCTS के बावजूद, रेगुलेटरी मुद्दे बने हुए हैं। पेट्रोकेमिकल्स और स्टील जैसे उद्योगों के लिए उत्सर्जन लक्ष्यों (Emission Targets) को तय करने में देरी, स्कीम के प्रभाव को कमजोर कर सकती है और ओवरसप्लाई (Oversupply) को जन्म दे सकती है। खास तौर पर, CCTS के शुरुआती चरणों से प्रमुख उत्सर्जक (Emitter) थर्मल पावर सेक्टर को बाहर रखना, इसके राष्ट्रीय प्रभाव को सीमित करता है। केन्या जैसे देशों के वैश्विक उदाहरण दिखाते हैं कि निगम प्रदूषण जारी रखते हुए क्रेडिट उत्पन्न कर सकते हैं। स्थानीय समुदायों के साथ टकराव और सहमति की कमी जैसी चिंताएं भी हैं। भारत की पिछली स्कीमें जैसे RECs और ESCerts, कम मांग और ओवरसप्लाई के कारण कीमतों में भारी गिरावट देख चुकी हैं, एक ऐसी भूल CCTS को टालनी होगी।
भविष्य की राह: ग्रोथ और वैश्विक सहयोग
भारत के कार्बन मार्केट में जबरदस्त ग्रोथ की उम्मीद है, जो 2026 में लगभग $1.7 बिलियन से बढ़कर 2035 तक $32 बिलियन से अधिक होने का अनुमान है। CCTS को पेरिस समझौते के आर्टिकल 6.2 (Article 6.2) जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के साथ एकीकृत करने से क्रॉस-बॉर्डर क्रेडिट ट्रेडिंग (Cross-border Credit Trading) को सक्षम किया जा सकता है और निवेश आकर्षित हो सकता है। सरकार का ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम (GCP) जैसे फ्रेमवर्क, लो-कार्बन फ्यूचर (Low-carbon Future) के प्रति प्रतिबद्धता दिखाते हैं। हालांकि, भारत की विशाल जलवायु वित्त (Climate Finance) जरूरतों को पूरा करने के लिए सिर्फ मार्केट मैकेनिज्म (Market Mechanisms) से कहीं अधिक की आवश्यकता होगी। सफलता के लिए वैश्विक पैमाने को घरेलू महत्वाकांक्षा से मिलाना, मजबूत गवर्नेंस (Governance), व्यापक सेक्टर समावेशन (Sector Inclusion) और वास्तविक उत्सर्जन में कमी के लिए विश्वसनीय मूल्य निर्धारण (Credible Pricing) सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा।