हिमालय के ग्लेशियर अब **65%** तेज गति से पिघल रहे हैं, जो भारत की **₹64.8 लाख करोड़** की अर्थव्यवस्था यानी जीडीपी के **21.5%** हिस्से के लिए एक बड़ा रिस्क बन सकता है।
हिमालय क्षेत्र के बदलते जलवायु पैटर्न का सीधा असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है। पिछले एक दशक की तुलना में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार 65% बढ़ गई है और अनुमान है कि साल 2100 तक इनका वॉल्यूम 80% तक कम हो सकता है। यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि उन सेक्टर्स के लिए बड़ी चुनौती है जो सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों पर निर्भर हैं।
हाइड्रोपावर सेक्टर के लिए बढ़ती चिंताएं
NHPC और SJVN जैसी बड़ी कंपनियां जो हिमालय बेल्ट में अपने प्रोजेक्ट्स चला रही हैं, उनके सामने 'पीक वाटर' और बाढ़ का दोहरा खतरा है। पानी की अनिश्चितता और आपदा प्रबंधन के बढ़ते खर्च से इन कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां अपने प्रोजेक्ट्स में क्लाइमेट रेजिलिएंस यानी आपदा-रोधी तकनीक पर कितना खर्च कर रही हैं।
खेती और महंगाई पर असर
उत्तरी भारत की कृषि व्यवस्था पूरी तरह ग्लेशियरों के पानी पर टिकी है। पानी के बहाव में बदलाव से गेहूं, चावल और गन्ने जैसी फसलों की सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है, जिससे फूड इंफ्लेशन बढ़ने का डर है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की नजरें भी इन बदलते हालातों पर टिकी हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर और रेगुलेटरी नियम
पहाड़ी इलाकों में 56 ऐसी झीलों की पहचान हुई है जो बहुत रिस्की हैं। इसके बाद सरकार और रेगुलेटरी बॉडीज निर्माण कार्यों पर कड़ी निगरानी रख सकती हैं। इससे भविष्य के प्रोजेक्ट्स में देरी हो सकती है और लागत में भी बढ़ोतरी होना तय है। आने वाले समय में कंपनियों के लिए आपदा-रोधी इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्ली-वार्निंग सिस्टम पर निवेश करना अनिवार्य होगा।
