विशाखापत्तनम में ₹1.3 लाख करोड़ का AI डेटा सेंटर हब, जिसमें Google, AdaniConneX और Nxtra by Airtel शामिल हैं, स्थानीय विरोध और हाई कोर्ट की चुनौती का सामना कर रहा है। कार्यकर्ताओं ने पानी की खपत, भूमि आवंटन और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई है, जिससे प्रोजेक्ट की समय-सीमा और निष्पादन पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।
प्रोजेक्ट पर क्यों हो रहा है विरोध?
विशाखापत्तनम में $15 बिलियन (लगभग ₹1.3 लाख करोड़) का एक बड़ा AI डेटा सेंटर हब बनने वाला है, लेकिन यह प्रोजेक्ट स्थानीय कार्यकर्ताओं के भारी विरोध और कानूनी चुनौतियों का सामना कर रहा है। यह Google की AdaniConneX और Nxtra by Airtel के साथ एक महत्वपूर्ण साझेदारी है, जिसका मकसद इस क्षेत्र के लिए एक अहम डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर हब तैयार करना है।
पर्यावरण और पानी की चिंताएं
पर्यावरण समूहों ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में इस प्रोजेक्ट को चुनौती दी है। उनकी मुख्य चिंताएं प्रोजेक्ट साइट के कंबलकंडा वन्यजीव अभयारण्य (Kambalakonda Wildlife Sanctuary) से निकटता के कारण पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर हैं। इसके अलावा, बड़े AI डेटा सेंटरों के लिए भारी मात्रा में पानी और बिजली की जरूरत होती है, जिसे लेकर स्थानीय निवासी चिंतित हैं कि इससे पानी की कमी वाले इलाकों में संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है। कुछ आरोप यह भी हैं कि प्रोजेक्ट के लिए आवंटित भूमि का कानूनी दर्जा संदिग्ध है, और कुछ जमीनें मंदिर की हो सकती हैं।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
निवेशकों के लिए यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि इसमें Adani Group की ज्वाइंट वेंचर AdaniConneX और Bharti Airtel की सहायक कंपनी Nxtra by Airtel जैसे बड़े सूचीबद्ध (listed) एंटिटीज शामिल हैं। इस तरह के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए विस्तृत पर्यावरण मंजूरी, भूमि अधिग्रहण की इजाजत और समुदाय का सहयोग जरूरी होता है। किसी भी लंबी कानूनी लड़ाई या साइट बदलने के आदेश से प्रोजेक्ट शुरू होने में देरी हो सकती है, लागत बढ़ सकती है और ESG (Environmental, Social, and Governance) प्रतिबद्धताओं पर भी सवाल उठ सकते हैं।
बढ़ती मांग और स्थानीय दबाव
पूरे भारत में AI-रेडी डेटा सेंटरों की मांग बढ़ रही है, लेकिन इन पर इंडस्ट्री की तरफ से भी ध्यान बढ़ रहा है। ये सुविधाएं डिजिटल विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन सामान्य स्टोरेज सेंटरों की तुलना में कहीं ज़्यादा बिजली और पानी की खपत करती हैं। हाल ही में ठाणे में ऐसे ही डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों से यह संकेत मिलता है कि स्थानीय समुदाय अब ऐसे प्रोजेक्ट्स की संसाधन खपत को लेकर आवाज़ उठा रहे हैं। इससे कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है कि वे पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) और साइट चयन प्रक्रियाओं में अधिक पारदर्शिता बरतें।
आगे क्या?
आगे चलकर निवेशकों को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट की कार्यवाही पर नजर रखनी होगी। पर्यावरण मंजूरी और भूमि उपयोग से संबंधित याचिकाओं पर अदालत का रुख प्रोजेक्ट की भविष्य की समय-सीमा तय करेगा। यदि निर्माण रोकने या पर्यावरण मंजूरी का पुनर्मूल्यांकन करने का कोई आदेश आता है, तो यह इसमें शामिल कंपनियों के हितधारकों (stakeholders) के लिए एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय होगा।
