WMO की रिपोर्ट के अनुसार, 2024-2025 के बीच **408 गीगाटन** ग्लेशियर पिघल गए हैं। यह 'पीक वाटर' की स्थिति भारत के हाइड्रो-पावर प्रोजेक्ट्स और कृषि क्षेत्र के लिए आने वाले समय में बड़ा रिस्क पैदा कर सकती है।
World Meteorological Organisation (WMO) के ताजा आंकड़ों ने ग्लोबल वार्मिंग को लेकर नई चेतावनी जारी की है। अक्टूबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच दुनिया भर में 408 गीगाटन ग्लेशियर बर्फ पिघल चुकी है। इससे समुद्र के जलस्तर में 1.1 मिमी की बढ़ोतरी हुई है। वैज्ञानिक इसे 'पीक वाटर' (peak water) फेज बता रहे हैं, जिसका मतलब है कि पिघलते पानी का बहाव एक समय के बाद हमेशा के लिए घटने लगेगा।
भारतीय निवेशकों के लिए चिंता का विषय
भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि हमारी नदियां जैसे सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र मुख्य रूप से हिमालय के ग्लेशियरों पर टिकी हैं। ये नदियां न केवल कृषि के लिए पानी देती हैं, बल्कि इनसे चलने वाले हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स की लाइफलाइन भी हैं।
हाइड्रो पावर सेक्टर: NHPC, SJVN और Tata Power जैसी कंपनियां अपनी बिजली उत्पादन के लिए पानी के स्थिर बहाव पर निर्भर हैं। अगर ग्लेशियरों से पानी का बहाव अनिश्चित हुआ, तो इन कंपनियों के प्लांट की एफिशिएंसी पर बुरा असर पड़ सकता है।
कृषि सेक्टर: उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में खेती पूरी तरह से नदियों से मिलने वाली सिंचाई व्यवस्था पर टिकी है। पानी के पैटर्न में बदलाव से खाद और बीज कंपनियों के कारोबार में अस्थिरता आ सकती है।
भविष्य को देखते हुए, निवेशकों को अब कंपनियों के रिस्क असेसमेंट में 'वॉटर मैनेजमेंट' और 'इरिगेशन एफिशिएंसी' जैसे फैक्टर्स पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।
