ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: कांग्रेस की मांग, पर्यावरण क्लीयरेंस पर रिपोर्ट हो सार्वजनिक!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: कांग्रेस की मांग, पर्यावरण क्लीयरेंस पर रिपोर्ट हो सार्वजनिक!

ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट, जिस पर **81,000 करोड़** रुपये का भारी-भरकम निवेश होने वाला है, अब विवादों में घिर गया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) से मांग की है कि इस प्रोजेक्ट को मिली पर्यावरण क्लीयरेंस से जुड़ी एक अहम रिपोर्ट को तुरंत सार्वजनिक किया जाए। यह मांग ऐसे समय में आई है जब लोकसभा में 'ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स बिल, 2026' पर भी चर्चा होनी है।

प्रोजेक्ट पर क्यों उठ रहे सवाल?

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) से गुजारिश की है कि 8 जुलाई, 2025 को सौंपी गई एक हाई-पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट को जारी किया जाए। इस रिपोर्ट में ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट को दी गई पर्यावरण संबंधी स्वीकृतियों (Environmental Clearances) का मूल्यांकन किया गया है। रमेश ने इस ₹81,000 करोड़ के प्रोजेक्ट को पर्यावरण के लिए चिंताजनक बताते हुए आरोप लगाया है कि NGT की पिछली मंजूरी भी इसी रिपोर्ट से प्रभावित थी, जो अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है।

'ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स बिल' का क्या है कनेक्शन?

इस मांग का समय भी काफी अहम है, क्योंकि लोकसभा में 'ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स बिल, 2026' पर चर्चा होने वाली है। इस प्रस्तावित कानून का मकसद सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करना है। इसके तहत एक नेशनल ट्रिब्यूनल्स कमीशन बनाने का प्रस्ताव है, जो NGT समेत 16 अर्ध-न्यायिक निकायों (Semi-judicial bodies) में नियुक्तियों और कामकाज की निगरानी करेगा। बिल के समर्थक इसे ट्रिब्यूनल्स की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और एकरूपता बढ़ाने वाला कदम बता रहे हैं, जबकि आलोचक इसे निगरानी से बचने का जरिया कह रहे हैं।

प्रोजेक्ट का दायरा और जोखिम

अंडमान और निकोबार आइलैंड्स इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (ANIIDCO) द्वारा लागू किया जा रहा यह प्रोजेक्ट एक बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर योजना है। इसमें एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, इंटरनेशनल एयरपोर्ट, पावर प्लांट और एक टाउनशिप का विकास शामिल है। इंफ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन सेक्टर के निवेशकों के लिए यह एक बड़ा लॉन्ग-टर्म निवेश का मौका है। हालांकि, शुरुआत से ही इस प्रोजेक्ट को रेगुलेटरी और पर्यावरण संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।

इस बड़े प्रोजेक्ट से जुड़े मुख्य जोखिमों में पर्यावरण मंजूरी की समीक्षा से होने वाली संभावित देरी, स्थानीय आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े मुकदमेबाजी और दूर-दराज के द्वीपों पर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की सामान्य चुनौतियां शामिल हैं। प्रोजेक्ट की स्वीकृतियों को लेकर कानूनी लड़ाई अक्सर अनिश्चितता पैदा करती है, जिससे ठेकेदारों के लिए लागत बढ़ने या समय-सीमा बदलने का खतरा रहता है।

इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में रुचि रखने वाले निवेशक और स्टेकहोल्डर्स 'ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स बिल, 2026' की प्रगति पर करीब से नजर रख रहे हैं। इस कानून के पारित होने और विवादित हाई-पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट के संभावित खुलासे का भविष्य में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की पर्यावरणीय समीक्षाओं पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। अगली बड़ी अपडेट लोकसभा में विधायी चर्चाओं के नतीजे और NGT की ओर से रिपोर्ट जारी करने के संबंध में किसी भी आदेश पर निर्भर करेगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.