बदलते पर्यावरण और हिमालयी ग्लेशियरों की अस्थिरता भारत के उन सेक्टर्स के लिए लंबी अवधि का जोखिम बन रही है जो पूरी तरह पानी पर निर्भर हैं। एक्सपर्ट्स अब इस बात पर नजर रख रहे हैं कि क्लाइमेट चेंज का असर सिंचाई और पनबिजली (Hydroelectric Power) उत्पादन को कैसे प्रभावित करेगा।
हाल ही में यूरोप में आए प्राकृतिक संकट और हिमालयी ग्लेशियरों में हो रहे बदलावों ने दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। हालांकि दुनिया भर में 'नेट जीरो' (Net Zero) टारगेट पर बहस जारी है, लेकिन जमीन पर हकीकत यह है कि पानी की कमी का सीधा असर भारत की कृषि और औद्योगिक गतिविधियों पर पड़ रहा है।
कृषि और वाटर सिक्योरिटी पर मार
भारतीय कृषि क्षेत्र की नींव सिंचाई के लिए मिलने वाले पानी पर टिकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ग्लेशियरों के पिघलने और हिमालयी क्षेत्र में अस्थिरता से प्रमुख नदियों के जल प्रवाह का पैटर्न बदल सकता है। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा संकेत है, क्योंकि पानी की आपूर्ति में कोई भी बाधा फसल चक्र और पैदावार को बिगाड़ सकती है, जिससे सप्लाई चेन में झटके लग सकते हैं।
हाइड्रो-पावर सेक्टर की मुश्किलें
भारत की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता का एक बड़ा हिस्सा हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्लांट्स से आता है। इन प्लांट्स का चलना नदियों के बहाव पर निर्भर है। यदि ग्लेशियरों के पिघलने या बेमौसम बारिश से जल स्तर अनिश्चित होता है, तो हाइड्रो-जनरेशन की एफिशिएंसी गिर सकती है। इससे पावर यूटिलिटीज को अपनी ऑपरेटिंग स्ट्रैटेजी बदलनी पड़ सकती है और उन्हें ग्रिड की स्थिरता बनाए रखने के लिए अन्य एनर्जी सोर्सेज की तरफ रुख करना होगा।
इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक जोखिम
जो क्षेत्र ग्लेशियरों के करीब हैं, वहां इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए खतरा बढ़ गया है। भविष्य में बाढ़ जैसी आपदाओं से निपटने के लिए मेंटेनेंस और डिजास्टर-प्रूफिंग पर होने वाला खर्च (Capital Expenditure) बढ़ सकता है। लंबी अवधि की ग्रोथ के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि भविष्य के किसी भी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की प्लानिंग में 'क्लाइमेट रेजिलिएंस' को प्राथमिकता दी जाए।
