फाइनेंस का भारी भरकम आंकड़ा, पर असली तस्वीर क्या है?
यह क्लाइमेट फाइनेंस में जबरदस्त बढ़ोतरी, जो कि एक बड़ी जीत लग सकती है, असल में एक जटिल वित्तीय खेल का नतीजा है। प्राइवेट सेक्टर से 1 ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा का अभूतपूर्व इजाफा, ये दिखाता है कि अब निवेश की दिशा बदल रही है। मगर, ये ग्रोथ एक कड़वी हकीकत को छुपा रही है: एडैप्टेशन (जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने की तैयारी) के प्रयासों को ज़रूरी फंड नहीं मिल पा रहा है, और जिस तरीके से ये आंकड़ा बढ़ रहा है – यानी कर्ज – वो दुनिया के कई कमज़ोर देशों को एक मुश्किल वित्तीय स्थिति में धकेल रहा है।
क्या है इस उछाल की वजह?
2023 में ग्लोबल क्लाइमेट फाइनेंस 1.9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचा, और शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि 2024 में यह 2 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गया। 2021 से 2023 के बीच इसमें सालाना 26% की भारी बढ़ोतरी देखी गई, जो 2018-2020 के 8% की ग्रोथ से कहीं ज़्यादा है। पहली बार प्राइवेट सेक्टर का योगदान 1 ट्रिलियन डॉलर के पार गया, जो पिछले साल के मुकाबले 50% से ज़्यादा की छलांग है। खास तौर पर, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और सोलर टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में घरों द्वारा किया गया निवेश, अस्थिर ऊर्जा कीमतों के चलते, सबसे बड़ा प्राइवेट फाइनेंसिंग का जरिया बना। 'मिटिगेशन' (ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना) पर 1.78 ट्रिलियन डॉलर खर्च हुए, जिसका बड़ा हिस्सा एनर्जी सेक्टर में गया।
गहराई से विश्लेषण: कहां है कमी?
कुल मिलाकर ग्रोथ के बावजूद, फाइनेंसिंग में एक बड़ा असंतुलन बना हुआ है। एडैप्टेशन फाइनेंस, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने और लचीलापन बनाने के लिए बेहद ज़रूरी है, 2023 में केवल 65 बिलियन डॉलर रहा। अनुमान है कि सिर्फ विकासशील देशों को 2030 तक हर साल 212 बिलियन डॉलर की ज़रूरत होगी। एग्रीकल्चर, फॉरेस्ट्री और लैंड यूज़ जैसे सेक्टर्स, जिन्हें सालाना 1 ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा चाहिए, उन्हें इसका सिर्फ 1% ही मिला। भौगोलिक तौर पर, क्लाइमेट फाइनेंस का 79% हिस्सा ईस्ट एशिया, पैसिफिक (खासकर चीन), पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में केंद्रित है। वहीं, चीन के बाहर के विकासशील देश ज़्यादातर पब्लिक फाइनेंस पर निर्भर हैं, जो 2023 में 196 बिलियन डॉलर तक पहुंचा, लेकिन इसमें से ज़्यादातर पैसा उनका अपना घरेलू फंड है। ऐतिहासिक रूप से, 2011 से 2020 के बीच क्लाइमेट फाइनेंस करीब दोगुना होकर औसतन 480 बिलियन डॉलर सालाना हो गया था। लेकिन, हाल के सालों में ग्रोथ की रफ़्तार धीमी पड़ गई है, और क्लाइमेट लक्ष्यों को पूरा करने के लिए 2030 तक निवेश को सात गुना बढ़ाना होगा।
कर्ज़ का जाल और बढ़ता संकट
2 ट्रिलियन डॉलर का यह बड़ा आंकड़ा एक खतरनाक तस्वीर छुपा रहा है: यह क्लाइमेट फाइनेंस पर कर्ज़ पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। हालांकि क्लाइमेट फाइनेंस के ज़्यादातर सेक्टरों में कर्ज़ का बोलबाला है, लेकिन 'कंसशनल फाइनेंस' (यानी कम ब्याज वाले या बिना ब्याज वाले लोन), जो गैर-राजस्व पैदा करने वाले एडैप्टेशन और रेजिलिएंस प्रोजेक्ट्स के लिए बहुत ज़रूरी है, लगभग न के बराबर है। यह कर्ज़-आधारित तरीका खासकर विकासशील देशों के लिए बड़ी समस्या पैदा कर रहा है, जो पहले से ही बढ़ते कर्ज के बोझ से जूझ रहे हैं। ग्लोबल ब्याज दरों में हुई बढ़ोतरी की वजह से कर्ज चुकाने की लागत बहुत बढ़ गई है। अफ्रीकी देशों ने 2022-2023 में कर्ज पर जर्मनी से आठ गुना ज़्यादा ब्याज चुकाया। जलवायु संवेदनशीलता (Climate Vulnerability) खुद एक देश की उधार लेने की औसत लागत को 100 बेसिस पॉइंट्स से बढ़ा देती है, जिससे एक दशक में अरबों डॉलर का अतिरिक्त ब्याज चुकाना पड़ता है। एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि इस तरह के लोन पर निर्भरता, खासकर गैर-कंसशनल लोन, कम आय वाले देशों को कर्ज के एक ऐसे चक्र में फंसा सकती है, जिससे जरूरी सेवाएं प्रभावित होंगी और वे जलवायु परिवर्तन से लड़ने में निवेश नहीं कर पाएंगे। यूएन का अनुमान है कि 2023 की शुरुआत में 60% कम आय वाले देश कर्ज संकट के उच्च जोखिम पर थे या पहले से ही कर्ज में डूबे थे। इसके अलावा, क्लाइमेट फाइनेंस का बहुत कम हिस्सा (3% से भी कम) लीस्ट डेवलप्ड कंट्रीज़ (LDCs) तक पहुंच रहा है।
आगे क्या?
एक्सपर्ट्स और इंटरनेशनल बॉडीज़ लगातार इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि क्लाइमेट फाइनेंस को कर्ज़ से हटाकर ग्रांट्स (अनुदान) और कंसशनल इंस्ट्रूमेंट्स की ओर मोड़ने की ज़रूरत है, खासकर एडैप्टेशन के लिए। कर्ज़ की स्थिरता का विश्लेषण करने वाले फ्रेमवर्क में सुधार किए जा रहे हैं ताकि जलवायु जोखिमों को बेहतर ढंग से शामिल किया जा सके, लेकिन अभी भी बड़े सिस्टमैटिक बदलावों की सख़्त ज़रूरत है ताकि क्लाइमेट-रेज़िलिएंट ग्रोथ को बढ़ावा मिल सके। 'डेट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप्स' (Debt-for-Climate Swaps) जैसे प्रस्ताव कर्ज और जलवायु संवेदनशीलता के दुष्चक्र को तोड़ने का लक्ष्य रखते हैं, ताकि सीधे जलवायु कार्रवाई के लिए फंड मिल सके। अगर पब्लिक फाइनेंस और सस्ते, कम बोझ वाले वित्तीय साधनों मेंsubstantial बढ़ोतरी नहीं हुई, तो क्लाइमेट फाइनेंस की ज़रूरत और असल फ्लो के बीच का अंतर, खासकर एडैप्टेशन के लिए, और बढ़ेगा। इससे सबसे ज़्यादा कमज़ोर देश जलवायु झटकों के प्रति और ज़्यादा असुरक्षित हो जाएंगे।
