बुलेट ट्रेन के लिए मैंग्रोव कटाई को बॉम्बे HC की हरी झंडी, पर सख्त हिदायत

ENVIRONMENT
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
बुलेट ट्रेन के लिए मैंग्रोव कटाई को बॉम्बे HC की हरी झंडी, पर सख्त हिदायत

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के लिए 13 किमी लंबी पावर लाइन बिछाने को मंजूरी मिल गई है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने **847** मैंग्रोव पेड़ों की कटाई की इजाजत दे दी है, लेकिन महाराष्ट्र सरकार को चार हफ्तों के अंदर पौधारोपण की निगरानी के लिए एक मजबूत सिस्टम बनाने का सख्त आदेश दिया है।

प्रोजेक्ट की अहमियत और कोर्ट का फैसला

बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर (बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट) के लिए जरूरी 132 KV पावर ट्रांसमिशन लाइन के निर्माण के लिए 847 मैंग्रोव पेड़ों को काटने की इजाजत दे दी है। महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड (MahaTransco) की याचिका पर कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट राष्ट्रीय महत्व का काम है, यही वजह है कि पर्यावरण मंजूरी दी गई।

13 किलोमीटर लंबी यह पावर लाइन दहानू सब-स्टेशन को पालघर जिले के अं berseराई ट्रैक्शन सब-स्टेशन से जोड़ेगी। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह मंजूरी किसी अन्य प्रोजेक्ट के लिए मिसाल नहीं मानी जाएगी और हर मामले को अलग से परखा जाएगा।

पौधारोपण पर सख्त निगरानी की मांग

कोर्ट ने जहां प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी, वहीं महाराष्ट्र सरकार के मौजूदा पर्यावरणीय नियमों के पालन पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि राज्य का पौधारोपण (compensatory afforestation) का तरीका संतोषजनक नहीं है। खासकर, सोलापुर में 7,457 गैर-मैंग्रोव पेड़ लगाने की योजना पर सवाल उठाते हुए कहा कि दूर-दूर लगाए गए ये पेड़, जहां से मैंग्रोव काटे गए हैं, वहां के पारिस्थितिकी संतुलन को बहाल नहीं कर सकते।

जजों ने सरकार के रवैये को 'उदासीनता' और 'डिफॉल्ट' बताया। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया है कि वह इन पौधों के रोपण और उनके जीवित रहने की निगरानी के लिए चार हफ्तों के भीतर एक पारदर्शी और मजबूत सिस्टम स्थापित करे। कोर्ट की सख्ती का मतलब है कि पर्यावरण बहाली सिर्फ कागजी नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत होनी चाहिए।

इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग पर असर

इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के निवेशकों और जानकारों के लिए यह फैसला राष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स और कड़े पर्यावरण नियमों के बीच चल रहे तनाव को दिखाता है। जहां एक ओर सरकार हाई-प्रायोरिटी प्रोजेक्ट्स के लिए अप्रूवल ले रही है, वहीं दूसरी ओर न्यायिक जांच भी तेज हो रही है। पारदर्शिता की यह मांग बताती है कि बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट्स से जुड़ी कंपनियों को अब अपने पर्यावरण सुधार उपायों, खासकर पौधारोपण, को सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि प्रोजेक्ट साइट के इकोलॉजिकल जरूरतों के हिसाब से भी प्रभावी बनाना होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.