ग्लोबल '30x30' टारगेट—जिसके तहत 2030 तक धरती के **30%** हिस्से को सुरक्षित करना है—पर खतरा मंडरा रहा है। माइनिंग और एनर्जी प्रोजेक्ट्स के प्रोटेक्टेड जोन में आने से निवेशकों के लिए रेगुलेटरी रिस्क और ESG अनुपालन का दबाव बढ़ गया है।
दुनिया भर में 2030 तक 30% जमीन और समुद्र को संरक्षित करने का लक्ष्य (30x30 टारगेट) फिलहाल बड़ी मुश्किलों का सामना कर रहा है। वर्तमान में भूमि का लगभग 20% और समुद्री क्षेत्र का केवल 10% ही संरक्षण के दायरे में आ पाया है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि कई प्रोटेक्टेड क्षेत्रों में माइनिंग, ऑयल और गैस कंपनियों के प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी
यह मामला अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर आपके पोर्टफोलियो और ऑपरेशनल रिस्क से जुड़ गया है। आर्मेनिया में 19-30 अक्टूबर 2026 को होने वाले COP17 समिट से पहले अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है। सरकारों पर यह दबाव है कि वे इन क्षेत्रों को पूरी तरह से इंडस्ट्रियल एक्टिविटी से मुक्त कराएं।
रिस्क और मॉनिटरेबल (Monitorables)
- रेगुलेटरी सख्ती: भारत और ग्लोबल मार्केट्स में BRSR (Business Responsibility and Sustainability Reporting) जैसे फ्रेमवर्क अब अधिक पारदर्शी प्रबंधन की मांग कर रहे हैं।
- एसेट वैल्युएशन: यदि कोई एरिया जिसे पहले माइनिंग के लिए उपलब्ध माना जाता था, अब पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाता है, तो इससे 'स्ट्रैंडेड एसेट्स' (Stranded Assets) का जोखिम पैदा हो सकता है।
- फाइनेंशियल बोझ: बायोडायवर्सिटी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए प्रति वर्ष $75 बिलियन से $150 बिलियन के फंड की जरूरत है। आशंका है कि सरकारें इसका बड़ा हिस्सा प्राइवेट सेक्टर से वसूल सकती हैं, जो कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर चोट कर सकता है।
आने वाले समय में COP17 समिट के नतीजे यह तय करेंगे कि लैंड-यूज रेगुलेशन कितने सख्त होंगे। निवेशकों को अब उन कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जिनके प्रोजेक्ट्स हाई-बायोडायवर्सिटी जोन में हैं।
