हवाई में एवियन मलेरिया का कहर: भारत के लिए जैव विविधता के खतरे की घंटी!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
हवाई में एवियन मलेरिया का कहर: भारत के लिए जैव विविधता के खतरे की घंटी!

हवाई द्वीपों पर एवियन मलेरिया (पक्षी मलेरिया) का भयंकर प्रकोप नेटिव हनीक्रीपर पक्षी प्रजातियों के लिए विनाशकारी साबित हो रहा है, जिससे वे विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गई हैं। यह संकट जलवायु परिवर्तन और आक्रामक मच्छरों के कारण बढ़ा है। जहाँ यह समस्या अभी प्रशांत महासागर तक सीमित है, वहीं भारत के पश्चिमी घाट में पक्षियों में पाए जाने वाले परजीवियों पर हो रहा शोध, जैव विविधता की निगरानी और पारिस्थितिकी पर पैनी नजर रखने की तत्काल आवश्यकता की ओर इशारा करता है।

क्या हुआ?

एवियन मलेरिया की एक व्यापक महामारी हवाई द्वीपों पर मूल पक्षी आबादी को तबाह कर रही है, जिससे कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। हाल के एक अध्ययन में कौआई, ओआहू, माउई और हवाई द्वीपों पर सर्वेक्षण की गई 64 जगहों में से 63 में परजीवी पाया गया। गैर-देशी दक्षिणी हाउस मच्छर (Culex quinquefasciatus) द्वारा फैलने वाली इस बीमारी के कारण मूल हवाई हनीक्रीपर प्रजातियों की संख्या 55 से घटकर केवल 17 रह गई है। यह महामारी काफी हद तक जलवायु परिवर्तन के कारण फैली है, जिसने मच्छरों को पहले सुरक्षित रहे उच्च-ऊंचाई वाले आवासों तक पहुंचने में सक्षम बनाया है, जहां मूल पक्षी कभी बिना किसी प्रतिरोधक क्षमता के पनपते थे।

संकट का तंत्र

हवाई का संकट इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक अकेली आक्रामक प्रजाति पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को अस्थिर कर सकती है। जब 1826 में दक्षिणी हाउस मच्छर को पेश किया गया था, तो लाखों वर्षों के अलगाव में विकसित हुए मूल पक्षियों में उन परजीवियों के प्रति प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता का अभाव था जो मच्छर ले जाते थे। वर्तमान शोध इस बात पर प्रकाश डालता है कि बीमारी अब इतनी व्यापक है कि प्रारंभिक संक्रमण से बचे पक्षी भी परजीवी को ले जाते हैं और फैलाते रहते हैं, जिससे संचरण का एक चक्र बन जाता है जिसे नियंत्रित करना बेहद मुश्किल हो जाता है। जैसे-जैसे तापमान में वृद्धि मच्छरों को पहाड़ी शरणस्थलों में गहराई तक घुसने में मदद कर रही है, मूल प्रजातियों के पास संक्रमण से बचने के लिए 'सुरक्षित क्षेत्र' कम होते जा रहे हैं।

भारत के पश्चिमी घाट के लिए प्रासंगिकता

जबकि हवाई का संकट पर्यावरणीय भेद्यता की एक चेतावनी भरी कहानी है, वैज्ञानिक ध्यान भारत के पश्चिमी घाट की ओर भी मुड़ रहा है। अपनी 'शोला स्काई आइलैंड्स' - अलग-थलग, उच्च-ऊंचाई वाले पहाड़ी जंगलों - के लिए जाना जाने वाला यह क्षेत्र पक्षी-परजीवी गतिशीलता का अध्ययन करने के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल है। भारत में शोधकर्ता एवियन हेमास्पोरिडियन परजीवियों जैसे प्लास्मोडियम, हेपेटोसिस्टिस और थेलरिया की निगरानी कर रहे हैं। हवाई की स्थिति के विपरीत, जहां मच्छर प्राथमिक वाहक हैं, पश्चिमी घाट में काटने वाली मक्खियों और काली मक्खियों जैसे विभिन्न कीट वैक्टरों को शामिल करते हुए एक अधिक जटिल महामारी विज्ञान का परिदृश्य है।

जैव विविधता और ESG के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है

भारतीय हितधारकों के लिए, यह स्थिति पारिस्थितिक निगरानी के महत्व को रेखांकित करती है। जैसे-जैसे निगमों के लिए पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) रिपोर्टिंग मानक अधिक सख्त होते जा रहे हैं, जैव विविधता पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को तेजी से एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक जोखिम के रूप में पहचाना जा रहा है। पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील आवासों का क्षरण - अक्सर जहां बुनियादी ढांचे या विकास परियोजनाएं संचालित होती हैं - दीर्घकालिक पारिस्थितिक अस्थिरता का कारण बन सकता है। वन्यजीव स्वास्थ्य की सक्रिय निगरानी जिम्मेदार भूमि उपयोग और पर्यावरण प्रबंधन का एक आवश्यक घटक बनती जा रही है, खासकर उच्च स्थानिक प्रजाति घनत्व वाले क्षेत्रों में।

हितधारक क्या ट्रैक कर सकते हैं

आगे बढ़ते हुए, निगरानी के प्राथमिक क्षेत्रों में वेक्टर-नियंत्रण प्रौद्योगिकियों की प्रगति शामिल है, जैसे कि हवाई में आबादी को नियंत्रित करने के लिए परीक्षण किए जा रहे वोलबाचिया-संक्रमित मच्छरों का उपयोग। इसके अतिरिक्त, पश्चिमी घाट में एवियन स्वास्थ्य पर निरंतर अनुदैर्ध्य अध्ययन भारत की अपनी जैव विविधता को रोग प्रसार में जलवायु-संचालित बदलावों से कैसे प्रभावित कर सकता है, इसे समझने के लिए महत्वपूर्ण होंगे। पर्यावरण डेटा पारदर्शिता और संरक्षण वित्तपोषण पर सार्वजनिक और निजी क्षेत्र का ध्यान इस बात का मुख्य संकेतक होगा कि क्षेत्र समान पारिस्थितिक दबावों के लिए कितनी अच्छी तरह तैयार हैं।

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