Uranium Supply Crunch: भारत के **100 GW** न्यूक्लियर लक्ष्य पर संकट के बादल, क्या फ्यूल की कमी बिगाड़ेगी गेम?

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AuthorMehul Desai|Published at:
Uranium Supply Crunch: भारत के **100 GW** न्यूक्लियर लक्ष्य पर संकट के बादल, क्या फ्यूल की कमी बिगाड़ेगी गेम?

इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) की रिपोर्ट ने ग्लोबल मार्केट में खलबली मचा दी है। एजेंसी का अनुमान है कि साल **2040** तक यूरेनियम का प्रोडक्शन **50%** तक गिर सकता है, जबकि मांग **2050** तक **144%** बढ़ने की उम्मीद है। भारत के **100 GW** न्यूक्लियर पावर टारगेट के लिए यह सप्लाई-डिमांड गैप एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

माइनिंग में अड़चनें और सप्लाई का संकट

न्यूक्लियर फ्यूल मार्केट में एक बड़ा असंतुलन देखने को मिल रहा है। यूरेनियम की नई खदानें खोजने और उन्हें पूरी तरह चालू करने में आमतौर पर 10 से 15 साल का लंबा वक्त लगता है। इस कारण मार्केट अचानक बढ़ती मांग को पूरा करने में अक्षम है। इसके अलावा, फ्यूल को रिएक्टर-ग्रेड में बदलने की प्रोसेसिंग क्षमता भी सीमित है, जो सप्लाई चेन को और भी ज्यादा असुरक्षित बना रही है।

भारत के लिए 'फ्यूल सिक्योरिटी' क्यों है जरूरी?

भारत का लक्ष्य 2047 तक 100 GW न्यूक्लियर क्षमता हासिल करना है। अक्सर इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों और सरकार का पूरा ध्यान रिएक्टर डिजाइन और निर्माण पर होता है, लेकिन यह ताजा रिपोर्ट साफ करती है कि 'फ्यूल सिक्योरिटी' ही पूरे प्रोग्राम की नींव है। अगर यूरेनियम की कमी होती है, तो फ्यूल की लागत बढ़ सकती है और रिएक्टरों के कमीशनिंग में देरी हो सकती है, जिससे पूरा प्रोजेक्ट महंगा हो जाएगा।

कूटनीति और निवेशकों के लिए मायने

भारत ने अब तक रूस, कजाकिस्तान और कनाडा जैसे देशों के साथ कूटनीतिक समझौतों के जरिए अपनी जरूरतों को पूरा किया है। भविष्य में इस लक्ष्य की सफलता पूरी तरह से भारत की फ्यूल प्रोक्योरमेंट डिप्लोमेसी पर टिकी होगी।

इन्वेस्टर्स को अब सिर्फ कंस्ट्रक्शन कॉन्ट्रैक्ट्स पर ही नहीं, बल्कि सरकार द्वारा किए जा रहे फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट्स और घरेलू प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की प्रगति पर भी बारीकी से नजर रखनी चाहिए।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.