US एडमिनिस्ट्रेशन ने फ्रांस और जर्मनी से इमरजेंसी रिजर्व से **120 मिलियन** बैरल डीजल रिलीज करने की मांग की है। इस मांग को न मानने पर US ने एक्सपोर्ट बैन की धमकी दी है, जिससे ग्लोबल एनर्जी मार्केट में हलचल बढ़ गई है और भारतीय निवेशकों की चिंताएं बढ़ सकती हैं।
अमेरिका की सख्त चेतावनी
US सरकार ने यूरोप के बड़े देशों, फ्रांस और जर्मनी को स्पष्ट चेतावनी दी है कि वे अपने इमरजेंसी स्टॉक से 120 मिलियन बैरल डीजल बाजार में उतारें। अमेरिका का यह कदम आगामी मिड-टर्म इलेक्शन से पहले घरेलू फ्यूल कीमतों को कंट्रोल में रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। अगर ये देश ऐसा नहीं करते हैं, तो अमेरिका डीजल एक्सपोर्ट पर कड़े प्रतिबंध लगा सकता है।
ग्लोबल एनर्जी मार्केट का संकट
फिलहाल दुनिया भर में एनर्जी सप्लाई चेन पहले ही दबाव में है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव, रूस के रिफाइनरी डैमेज और चीन द्वारा फ्यूल एक्सपोर्ट घटाने के फैसलों ने सप्लाई को और टाइट कर दिया है। यूरोप के देश, जो पहले से ही रशियन एनर्जी पर निर्भरता कम करने के चलते मुश्किलों में हैं, अब इस नई डिमांड के कारण दुविधा में हैं।
भारतीय निवेशकों पर क्या असर होगा?
भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा क्रूड ऑयल और फ्यूल के इंपोर्ट के जरिए पूरा करता है। ग्लोबल लेवल पर फ्यूल की कीमतें बढ़ने का मतलब है भारत का 'इंपोर्ट बिल' बढ़ना, जिसका सीधा असर भारतीय रुपये की वैल्यू और देश में महंगाई पर पड़ सकता है।
OMCs के लिए रिस्क
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस उठापटक का असर सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) जैसे Indian Oil Corporation, BPCL और HPCL के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ सकता है। अगर ग्लोबल डीजल कीमतें उछलती हैं और कंपनियां इसे पूरी तरह ग्राहकों पर नहीं डाल पातीं, तो उनके मार्जिन पर दबाव बढ़ना तय है।
फिलहाल फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron इस मुद्दे पर G7 देशों की एक वीडियो कॉन्फ्रेंस आयोजित कर रहे हैं ताकि International Energy Agency के साथ मिलकर कोई सामूहिक रास्ता निकाला जा सके। निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या कोई समझौता हो पाता है या यह तनाव फ्यूल प्राइसेज में और अधिक उछाल लाएगा।
